Amalaki Ekadashi 2026: मान्यता है कि जो भक्त इस व्रत को सच्चे मन और श्रद्धा के साथ करते हैं, उनके पापों का क्षय होता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का निवास माना जाता है, इसलिए इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करना और उसका सेवन करना अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है। कहा जाता है कि यह पवित्र व्रत जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा लाता है। 🌿🙏
हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। पंचांग के अनुसार पूरे वर्ष में 24 एकादशी आती हैं और उनमें से एक प्रमुख है आमलकी एकादशी, जो फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है। इसे अमला एकादशी या रंगभरी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस पावन दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ आंवले के वृक्ष की भी पूजा की जाती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार काशी में इसी दिन से होली के उत्सव की शुरुआत होती है, इसलिए इसे रंगभरी एकादशी कहा जाता है। कहा जाता है कि जो भक्त इस व्रत को श्रद्धा और भक्ति के साथ रखते हैं, उनके पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग खुलता है। मान्यता है कि आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का वास होता है, इसलिए इस दिन आंवले की पूजा करना और उसका सेवन करना अत्यंत शुभ माना गया है। यह व्रत व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाने वाला माना जाता है।
ऐसे में आइए जानते हैं कि साल 2026 में आमलकी एकादशी का व्रत कब रखा जाएगा, साथ ही जानेंगे पूजा का शुभ मुहूर्त, पारण का सही समय और व्रत से जुड़ी पूरी विधि।
Amalaki Ekadashi: आमलकी एकादशी कब है?
पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 27 फरवरी को रात 12:33 बजे से शुरू होकर उसी दिन रात 10:32 बजे तक रहेगी। इसलिए वर्ष 2026 में आमलकी एकादशी का व्रत 27 फरवरी, शुक्रवार को रखा जाएगा। उदय तिथि के आधार पर इसी दिन व्रत करना शुभ और मान्य माना जाएगा।
पारण का समय
एकादशी व्रत का पारण 28 फरवरी को सुबह 6:47 बजे से 9:06 बजे के बीच किया जाएगा।
आमलकी एकादशी का शुभ मुहूर्त
इस बार आमलकी एकादशी पर कई शुभ योगों का संयोग बन रहा है। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग, रवि योग, आयुष्मान योग और सौभाग्य योग बन रहे हैं, जो इस पर्व के महत्व को और बढ़ा देते हैं। मान्यता है कि इन शुभ योगों में भगवान की पूजा, जप-तप और दान करने से कई गुना अधिक पुण्य फल प्राप्त होता है।
आमलकी एकादशी की पूजा विधि
आमलकी एकादशी के दिन प्रातः काल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। मंदिर या पूजा स्थान पर दीपक जलाएं और भगवान विष्णु को धूप, फूल, फल तथा तुलसी अर्पित करें। पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का श्रद्धा पूर्वक जप करें। इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व माना गया है। आंवले के पेड़ पर जल अर्पित करें और उसके नीचे दीपक जलाकर भगवान विष्णु से सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। दिनभर व्रत रखें और शाम को पूजा व आरती के बाद प्रसाद ग्रहण करें।
आमलकी एकादशी व्रत के नियम
आमलकी एकादशी का व्रत करते समय कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक माना जाता है। इस दिन चावल, दाल, मांसाहार और शराब का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए। दिन में सोना और बाल कटवाना भी इस दिन वर्जित माना जाता है। भगवान को भोग के रूप में आंवले से बने व्यंजन, मखाने की खीर, साबूदाना, नारियल और घी से बनी मिठाइयाँ अर्पित की जा सकती हैं। इसके अलावा जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र, अन्न और आंवला दान करना अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना गया है।
आमलकी एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार राजा मांधाता ने महर्षि वशिष्ठ से कहा— हे गुरुदेव! कृपा करके मुझे ऐसा व्रत बताइए जिससे मेरा कल्याण हो सके। तब महर्षि वशिष्ठ ने उत्तर दिया— हे राजन्! सभी व्रतों में श्रेष्ठ और अंत में मोक्ष देने वाला व्रत आमलकी एकादशी है। यह फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में आती है।
प्राचीन समय में वैदिश नाम का एक नगर था, जहां सभी वर्णों के लोग सुखपूर्वक रहते थे। उस नगर में वेदों की ध्वनि गूंजती रहती थी और वहां कोई भी पापी या अधर्मी व्यक्ति नहीं था। उस राज्य के राजा चैतरथ थे, जो अत्यंत धर्मपरायण, विद्वान और प्रजा का भला चाहने वाले थे। नगर के सभी लोग भगवान विष्णु के भक्त थे और स्त्री-पुरुष, बच्चे तथा वृद्ध सभी श्रद्धा से एकादशी का व्रत रखते थे।
एक बार फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आई। उस दिन राजा और पूरी प्रजा ने मिलकर व्रत किया और मंदिर में जाकर पूर्ण कलश स्थापित किया। सभी ने धूप, दीप, नैवेद्य और अन्य पूजन सामग्री से आंवले (धात्री) के वृक्ष की पूजा की और प्रार्थना की—
हे धात्री! आप ब्रह्मस्वरूप हैं, ब्रह्मा जी द्वारा उत्पन्न हैं और सभी पापों का नाश करने वाली हैं। कृपया हमारा अर्घ्य स्वीकार करें और हमारे सभी पापों का नाश करें।
उस दिन सभी भक्तों ने रातभर मंदिर में जागरण किया।
उसी रात एक बहेलिया (शिकारी) वहां आया। वह बहुत पापी था और जीवों का शिकार करके अपना जीवन चलाता था। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह मंदिर के एक कोने में बैठ गया। वहां बैठकर उसने भगवान विष्णु की कथा और एकादशी का माहात्म्य सुना। इस प्रकार अनजाने में ही उसने भी पूरी रात जागरण कर लिया।
सुबह होने पर सभी लोग अपने घर चले गए और वह बहेलिया भी अपने घर लौट गया। कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई। लेकिन आमलकी एकादशी के व्रत और जागरण के प्रभाव से अगले जन्म में वह राजा विदूरथ के घर जन्मा और उसका नाम वसुरथ रखा गया।
बड़ा होकर वसुरथ अत्यंत तेजस्वी, पराक्रमी और धर्मात्मा राजा बना। उसके राज्य में धन-धान्य की कमी नहीं थी और वह भगवान विष्णु का महान भक्त था। वह अपनी प्रजा का पालन न्यायपूर्वक करता और दान देना उसका स्वभाव था।
एक दिन वह शिकार के लिए जंगल गया और रास्ता भटककर एक वृक्ष के नीचे सो गया। तभी कुछ म्लेच्छ वहां पहुंचे और राजा को अकेला देखकर उस पर आक्रमण करने लगे। उन्होंने अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र चलाए, लेकिन वे सभी राजा को हानि पहुंचाने के बजाय नष्ट हो गए।
उसी समय राजा के शरीर से एक दिव्य स्त्री प्रकट हुई। उसका रूप तेजस्वी और भयंकर था। उसकी आंखों से अग्नि निकल रही थी। उसने उन सभी आक्रमणकारियों का संहार कर दिया।
जब राजा की नींद खुली तो उसने चारों ओर शत्रुओं को मृत पाया और आश्चर्य करने लगा कि उसकी रक्षा किसने की। तभी आकाशवाणी हुई—
हे राजन्! इस संसार में भगवान विष्णु के सिवा और कौन तुम्हारी रक्षा कर सकता है?
यह सुनकर राजा समझ गया कि यह सब आमलकी एकादशी व्रत का प्रभाव है। वह अपने राज्य लौट आया और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा।
महर्षि वशिष्ठ ने अंत में कहा—
जो भी व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से आमलकी एकादशी का व्रत करता है, उसे जीवन में सफलता मिलती है और अंत में वह विष्णुलोक को प्राप्त करता है।




