सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण का 5252वाँ जन्मोत्सव कब और कैसे मनाएं
हिंदू धर्म में जन्माष्टमी व्रत को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दिन भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था. भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को बुधवार के दिन रोहिणी नक्षत्र और वृष राशि के चंद्रमा में हुआ था. इसलिए शास्त्रों में इस दिन व्रत रखने का नियम है. जन्माष्टमी के व्रत को बच्चे, जवान, वृद्ध सभी लोग कर सकते हैं. भारतवर्ष के कुछ प्रांतों में जन्माष्टमी का व्रत सूर्य उदय कालीन अष्टमी तिथि को तथा कुछ जगहों पर तत्काल व्यापिनी अर्धरात्रि में पडने वाली अष्टमी तिथि को किया जाता है. सिद्धांत रूप से अगर देखा जाए तो इसकी मान्यता अधिक है. जिन लोगों ने खास विधि विधान के साथ वैष्णव संप्रदाय की दीक्षा ग्रहण की है वह लोग वैष्णव कहलाते हैं. बाकी अन्य सभी लोग स्मार्त कहलाते हैं, पर इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि यह सभी लोग भगवान विष्णु की पूजा अर्चना नहीं कर सकते हैं. सभी लोग समान रूप से भगवान विष्णु की पूजा उपासना कर सकते हैं. लोक व्यवहार के अनुसार वैष्णव संप्रदाय के साधु संत उदय कालीन एकादशी तिथि को जन्माष्टमी का व्रत करते हैं.
अष्टमी तिथि प्रारम्भ – अगस्त 15, 2025 को 11:49 बजे तक अष्टमी तिथि समाप्त – अगस्त 16, 2025 को 09:34 बजे तक
पूजा का समय – मध्यरात्रि 12:04 से 12:47 तक
पारण : 17अगस्त प्रातः 05:51
रोहिणी नक्षत्र प्रारम्भ – अगस्त 17, 2025 को 04:38 बजे तक
रोहिणी नक्षत्र के बिना जन्माष्टमी पारण के दिन अष्टमी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी। रोहिणी नक्षत्र समाप्त – अगस्त 18, 2025 को 03:17 बजे तक
जन्माष्टमी व्रत में क्या खाएं क्या नहीं और व्रत का पालन कैसे करें ?
जन्माष्टमी व्रत तीन तरह से रखा जाता है: ■ निर्जला ■ निराहार ■ फलाहार
● निर्जला – यानि कि व्रत वाले दिन सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक बिना जल, फल के।
● निराहार – यानि कि सुबह पूजा के बाद पानी, चाय, दूध, दही, जूस आदि लिक्विड चीजें ग्रहण करके।
● फलाहार – यानि कि सुबह पूजा के बाद फल और ड्राई फ्रूट्स खा पीकर।
● व्रत कोई भी हो किसी की देखा-देखी में आकर व्रत नहीं करना चाहिए, व्रत सदैव अपने शरीर की शक्ति के अनुसार इनमें से किसी भी तरह रख सकते हैं, क्योंकि न करने से कुछ करना सदैव लाभकारी व हितकारी ही रहा है। ● जन्माष्टमी के व्रत में आप फलाहार ले सकते हैं लेकिन अन्न को ग्रहण नहीं करना चाहिए, कई लोग इस व्रत को रात 12 बजे के बाद ही खोलते हैं तो कई इस व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद करते हैं।
जन्माष्टमी पूजन विधि :-
जन्माष्टमी के दिन प्रातः काल सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करने के पश्चात व्रत करने का संकल्प करें.
संकल्प:-
“हे भगवान, मैं आपकी विशेष कृपा पाने के लिए व्रत करने का संकल्प लेता हूं. हे परमेश्वर आप मेरे द्वारा किए गए सभी पापों और बुरे कर्मों का नाश करें.”
इसके पश्चात पूरा दिन और पूरी रात निराहार व्रत करें. अगर आप व्रत करने में सक्षम नहीं है तो आप दिन में फलाहार और दूध भी ले सकते हैं.
व्रत के दिन पूरा दिन और पूरी रात भगवान बालकृष्ण का ध्यान, जप, पूजा, भजन, कीरतन आदि करें.
जन्माष्टमी के दिन भगवान के दिव्य स्वरूप का दर्शन करें और उनकी कथा सुनाएं. अपनी क्षमता अनुसार ब्राह्मणों और गरीब लोगों को दान दें.
जन्माष्टमी की पूजा करने के लिए एक लाल कपड़े पर बालकृष्ण और देवकी माता की मूर्ति की स्थापना करें. आप अपनी क्षमता के अनुसार सोने, चांदी, पीतल, मिट्टी की मूर्ति की स्थापना कर सकते हैं.
भगवान श्री कृष्ण के आसपास गांव, कालिया नाग मर्दन, गिरिराज धरण, बकासुर वध,अघासुर वध, पूतना वध, गज, मयूर, अद्भुत चित्रकृत्य से सुंदर झांकी सजाए.
माता देवकी और बालकृष्ण की षोडशोपचार द्वारा पूजन करें. पूजा करने के बाद नीचे दिए गए मंत्र का जाप करें.
ओम नमो देवी श्रिये
पंचामृत से लड्डू गोपाल का अभिषेक करके भगवान को नए वस्त्र अर्पित करें और लड्डू गोपाल को श्रद्धा पूर्वक झूला झुलाए.
पंचामृत में तुलसी के पत्ते डालकर माखन मिश्री और धनिया की पंजीरी बनाकर भगवान का भोग लगाएं. इसके पश्चात आरती करके सभी भक्तों को प्रसाद बांटे. इस दिन चंद्रमा की पूजा करना भी शुभ माना जाता है.
जन्माष्टमी व्रत का महत्व :-
शास्त्रों में जन्माष्टमी व्रत को व्रत राज कहा गया है. भविष्य पुराण में बताया गया है कि जिस घर में यह व्रत किया जाता है वहां पर अकाल मृत्यु, गर्भपात, वैधव्य, दुर्भाग्य और कलह आदि का भय समाप्त हो जाता है.
जो भी मनुष्य एक बार इस व्रत को करता है वह इस संसार के सभी सुखों को भोग कर मृत्यु के पश्चात वैकुंठधाम में निवास करता है.
जन्माष्टमी के दिन असत्य ना बोले. इस तरह से सभी शारीरिक इंद्रियों को सैयम में रखकर किया गया व्रत मनोवांछित फल देता है.
सिर्फ एक इंद्रियों का संयम अर्थात केवल अन्न का त्याग कर देने से तथा अन्य इंद्रियों को संयम में ना रखने से किसी भी उपवास का पूरा फल प्राप्त नहीं होता है. इसलिए जहां तक संभव हो सके नियम पूर्वक और संयम पूर्वक व्रत करना चाहिए.
जो लोग पूजा करने में समर्थ नहीं है या अस्वस्थ हैं उन्हें सिर्फ भगवान् कृष्ण का पूजन करके भोजन ग्रहण कर लेना चाहिए.
जो लोग व्रत कर सकते है उन्हें रात्रि 12:00 बजे भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाना चाहिए. अगले दिन सुबह स्नान करने के पश्चात भगवान श्री कृष्ण की पूजा करके व्रत का पारण करना चाहिए.
अगर कोई पहले ही भोजन करना चाहता है तो रात्रि में भगवान कृष्ण का जन्म उत्सव मनाकर प्रसाद ग्रहण करने के पश्चात भोजन कर सकता है.
भगवान कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत सभी पापों का नाश करता है. श्रद्धा और नियम पूर्वक जन्माष्टमी का व्रत करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है.
जन्माष्टमी व्रत के लाभ :-
जन्माष्टमी व्रत का लाभ पाने के लिए आप भगवान कृष्ण को कुछ विशेष चीजें अर्पित कर सकते हैं. आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से कुछ ऐसी चीजों के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्हें श्रीकृष्ण अर्पित करने से आप लाभ प्राप्त कर सकते हैं.
धन लाभ पाने के लिए जन्माष्टमी के दिन भगवान राधा कृष्ण के मंदिर में जाकर भगवान कृष्ण और राधा को पीले फूलों की माला अर्पित करें.
जन्माष्टमी पर भगवान श्री कृष्ण की खास कृपा पाने के लिए विधि विधान से पूजा करने के पश्चात भगवान श्री कृष्ण को सफेद मिठाई, साबूदाने या फिर चावल की खीर का भोग लगाएं. ऐसा करने से आपको भगवान श्री कृष्ण की विशेष कृपा मिलेगी.
माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने और धन लाभ पाने के लिए जन्माष्टमी के दिन श्रीकृष्ण को दक्षिणावर्ती शंख में गंगाजल भरकर स्नान कराएं.
अगर बार-बार आपके काम में रुकावट आ रही है तो जन्माष्टमी के दिन भगवान श्री कृष्ण के मंदिर में जाकर एक जटा वाला नारियल और 11 बादाम अर्पित करें. ऐसा करने से आपके कार्य में आ रही रुकावट दूर हो जाएगी.
मनचाही नौकरी प्राप्त करने के लिए जन्माष्टमी के दिन चावल की खीर बनाकर भगवान कृष्ण को भोग लगाएं. और बाद में छोटी कन्या में वितरित करें.
जन्माष्टमी के दिन भगवान श्री कृष्ण की पूजा करने के पश्चात पूजा स्थल से ₹1 का सिक्का उठा कर अपने पर्स में रखें. ऐसा करने से आपका पर्स हमेशा भरा रहेगा.
भगवान श्री कृष्ण का विशेष आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए जन्माष्टमी के दिन रात्रि 12:00 बजे भगवान श्री कृष्ण का दूध से अभिषेक करें.
वैवाहिक जीवन की समस्याओं को दूर करने के लिए जन्माष्टमी के दिन पीली चीजों का दान करें.
विद्या लाभ प्राप्त करने के लिए जन्माष्टमी के दिन भगवान श्री कृष्ण को मोर पंख अर्पित करें.
अगर आप स्वास्थ्य लाभ पाना चाहते हैं तो जन्माष्टमी के दिन भगवान श्री कृष्ण के मंत्र का जाप करें.
बसंत पंचमी(Basant Panchami) का उत्सव माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व वास्तव में ऋतुराज बसंत के आगमन की सूचना देता है। इस दिन से ही होरी तथा धमार के गीत प्रारम्भ किए जाते हैं।
गेहूँ तथा जौ की स्वर्णिम बालियां भगवान को अर्पित की जाती हैं। इस दिन भगवान विष्णु तथा सरस्वती माँ के पूजन का विशेष महत्व है।
भगवान विष्णु की आज्ञा से प्रजापति ब्रह्मा जी जब सृष्टि की रचना करके जब उस संसार को देखते हैं तो उन्हें चारों तरफ सूनसान और निर्जन ही दिखाई देता है। उदासी से सारा वातावरण मूक सा जान पड़ता है। जैसे किसी के कोई वाणी न हो।
यह देखकर ब्रह्मा जी ने उदासी और मलीनता को दूर करने के लिए अपने कमंडल से जल छिड़का। उन जलकणों के पड़ते ही वृक्षों से एक शक्ति उत्पन्न हुई जो दोनों हाथों से वीणा बजा रही थी तथा दो हाथों में क्रमशः पुस्तक तथा माला धारण किए थीं। ब्रह्मा जी ने उन देवी से वीणा बजाकर संसार की मूकता तथा उदासी दूर करने को कहा।
तब उन देवी ने वीणा के मधुर नाद से सब जीवों को वाणी प्रदान की ,इसलिए उन देवी को सरस्वती कहा गया। यह देवी विद्या तथा बुद्धि को देने वाली हैं ,इसलिए इस दिन हर घर में देवी सरस्वती का पूजन किया जाता है।
बसंत पंचमी का महत्व -Basant Panchami Mahatva
बसंत पंचमी का दिन बहुत शुभ माना जाता है। इसे अबूझ मुहूर्त की संज्ञा प्राप्त है। इसका अर्थ है अक्षय तृतीया और देवउठान एकादशी की तरह इस दिन पूरा दिन शुभ माना जाता है और मुहूर्त आदि के लिए पंचांग देखने की भी आवश्यकता नहीं होती। इसलिए यह दिन किसी भी अच्छे कार्य को प्रारंभ करने के लिए बहुत शुभ है।
ऐसी मान्यता है कि बसंत पंचमी के दिन ही मनुष्य को शब्द की शक्ति प्राप्त हुई थी। इस दिन से ही मानव को भाषा और बोली का ज्ञान प्राप्त हुआ। इसलिए बसंत पंचमी के दिन ही बच्चों को पहला अक्षर लिखना सिखाया जाता है।
ऐसी मान्यता है की माँ सरस्वती के पूजन का प्रारंभ भगवान श्री कृष्ण ने किया था।
इस दिन पितरों का तर्पण करने का भी विधान है।
कुछ क्षेत्रों में आज के दिन कामदेव की पूजा का भी प्रचलन है।
बसंत पंचमी के दिन वाद्य यंत्रो की पूजा की जाती है। व्यापारी वर्ग इस दिन अपने बांटो और बहीखातों का भी पूजन करते हैं।
बच्चे अपनी पुस्तकों का पूजन करते हैं।
कैसे करें माँ सरस्वती का पूजन-Saraswati PujaVidhi
स्नान आदि करके पीले अथवा श्वेत वस्त्र धारण करें। सूर्य भगवान को अर्घ्य दें।
इसके पश्चात जिस स्थान पर माँ का पूजन करना हो उसे अच्छे से साफ़ करें।
माँ की तस्वीर या प्रतिमा रखें। पूजन पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके ही करें।
कलश की स्थापना करें ,गणपति और नवग्रह की भी स्थापना करें।
माँ को हल्दी व श्वेत चंदन अर्पित करें। अक्षत और लौंग का जोड़ा अर्पित करें।
पीले और श्वेत पुष्प चढ़ाए। सिंदूर व श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें।
पीले फल ,बूंदी और केसर मिश्रित खीर का भोग माँ को लगाएं।
“ऐं” मंत्र का जप करें। कम से कम एक एक माला करें।
यज्ञ अवश्य करें। संविदा में पीली सरसों और गुड़ मिलाएं। “ॐ ऐं नमः स्वाहा” इस मंत्र द्वारा आहुति दें।
हल्दी मिश्रित पीले चावल का दान अवश्य निकाले।
इस दिन आप जो भी कार्य करते हैं उससे संबंधित वस्तु का पूजन अवश्य करें।
Saraswati Puja Vidhi-सरस्वती पूजा विधि
ध्यान
सर्वप्रथम सरस्वती जी की प्रतिमा के सम्मुख बैठकर निम्न मंत्र द्वारा माँ का ध्यान करें।
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता ।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता ।
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा ।
आवाहन
इसके पश्चात दोनों हाथ जोड़कर निम्न मंत्र द्वारा माँ सरस्वती का आवाहन करें।
आगच्छ देव-देवेशि ! तेजोमयि सरस्वती!
क्रियमाणां मया पूजां, गृहाण सुर-वन्दिते!
श्रीसरस्वती-देवीं आवाहयामि।
आसन
आवाहन के पश्चात दोनों हाथों की अंजलि में पांच पुष्प लेकर निम्न मंत्र द्वारा मां को आसन प्रदान करते हुए मां की प्रतिमा के सम्मुख पुष्प छोड़ें।
इसके पश्चात् मां सरस्वती का चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य द्वारा निम्न मंत्र पढ़ते हुए पूजन करें।
ॐ श्रीसरस्वती-देव्यै नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
ॐ श्रीसरस्वती-देव्यै नमः शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि।
ॐ श्रीसरस्वती-देव्यै नमः गंन्धाक्षतं समर्पयामि।
ॐ श्रीसरस्वती-देव्यै नमः पुष्पं समर्पयामि।
ॐ श्रीसरस्वती-देव्यै नमः धूपं घ्रापयामि।
ॐ श्रीसरस्वती-देव्यै नमः दीपं दर्शयामि।
ॐ श्रीसरस्वती-देव्यै नमः नैवेद्यं समर्पयामि।
ॐ श्रीसरस्वती-देव्यैनमःआचमनीयं समर्पयामि।
ॐ श्रीसरस्वती-देव्यै नमः ताम्बूलं समर्पयामि।
पूजन समर्पण
ऊपर बताई हुई विधि के अनुसार पूजन करने के पश्चात बांये हाथ में आकर्षण और पुष्प लेकर निम्न मंत्र को पढ़ते हुए दांएं हाथ से बही-खाते अथवा किताबों पर अक्षत पुष्प छिड़के।
ॐ श्रीसरस्वत्यै नमः।अनेन पूजनेन श्रीसरस्वती देवी प्रीयताम्। नमो नमः ।
बसंत पंचमी के विशेष ज्योतिषीय उपाय -Basant Panchami Astrological Remedies
बसंत पंचमी का दिन ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन को अबूझ मुहूर्त में गिना जाता है। इसका अर्थ है कि इस दिन किसी कार्य को करने के लिए पंचांग देखने की भी जरूरत नहीं होती है।
पूरे दिन में किसी भी समय आप शुभ कार्य को प्रारम्भ कर सकते हैं। इस दिन कुछ ज्योतिष उपाय करने से बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। आप अपनी कुंडली में ग्रहों की स्थिति के अनुसार निम्न ज्योतिषीय उपाय कर सकते हैं।
यदि कुंडली में शिक्षा में बाधा का योग बन रहा हो तो इस दिन माँ सरस्वती की पूजा पूरे मन से करें और माँ से ये प्रार्थना करें कि मेरी शिक्षा में जो भी बाधा आ रहीं हैं उन्हें दूर करें।
यदि कुंडली में बुध ग्रह की स्थिति कमजोर है तो इस दिन हरे फल अर्पित कर माँ सरस्वती की आराधना करें। साथ ही इस दिन से “ॐ बुं बुधाय नमः” या “ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः।” इस मंत्र का सवा लाख जप करने का संकल्प लें। ऐसा करने से आपको बुध ग्रह के अच्छे परिणाम मिलने लगेंगे।
यदि कुंडली में बृहस्पति की स्थिति कमजोर है तो इस दिन पीले वस्त्र धारण करें और माँ सरस्वती को पीले पुष्प और फल अर्पित कर माँ की आराधना करें।
देवउठान एकादशी के दिन श्री हरि के शालिग्राम रूप के साथ तुलसी विवाह संपन्न कराया जाता है। इस विवाह को पूरे विधि-विधान के साथ के साथ किया जाता है। जो भी इस दिन शालिग्राम के साथ तुलसी जी के साथ कराता है उसपर सदैव भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है।
इस दिन महिलाएं तुलसी जी को शृंगार का समान अर्पित करती हैं। तुलसी जी को भी दुल्हन की तरह सजाया जाता है। फिर उनका शालिग्राम के साथ विवाह सम्पन्न कराया जाता है। महिलाएं मंगल गीत गाती हैं।
महर्षि कश्यप की पत्नियों में एक का नाम दनु था। दनु के बहुत से महाबली पुत्र उत्पन्न हुए उनमें से एक का नाम विप्रचित्ति था जो महान बल पराक्रम से संपन्न था। उसका पुत्र दम्भ हुआ जो जितेंद्रिय धार्मिक तथा विष्णु भक्त था जब उसके कोई पुत्र नहीं हुआ तो उसको चिंता हुई उसने शुक्राचार्य को गुरु बना कर उनसे श्री कृष्ण मंत्र प्राप्त किया और पुष्कर में जाकर घोर तप करना आरंभ किया।
उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसको दर्शन दिया तब दंभ ने भगवान विष्णु से उनकी वंदना करके ऐसे वीर पुत्र का वरदान मांगा जो त्रिलोक को जीत ले परंतु देवता उसे पराजित ना कर सके।
कुछ समय पश्चात दंभ की पत्नी गर्भवती हुई और उसके गर्भ में श्री कृष्ण के पार्षदों में अग्रणी सुदामा नामक गोप प्रविष्ट हुआ। सुदामा को राधा जी ने क्रोधित होकर राक्षस कुल में जन्म लेने का श्राप दिया था।
कुछ समय पश्चात दंभ की पत्नी ने एक तेजस्वी बालक को जन्म दिया जिसका नाम शंखचूर्ण रखा गया शंखचूर्णअपने पिता के घर में शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की भांति बढ़ने लगा वह बहुत तेजस्वी था अतः उसने बचपन में ही सारी विद्या सीख ली शंखचूर्ण जब बड़ा हुआ तो पुष्कर में जाकर ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करने लगा उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे दर्शन दिया।शंखचूर्ण ने ब्रह्मा जी की वंदना की और और ब्रह्मा जी से वरदान मांगा कि वह देवताओं के लिए अजेय हो जाए तब ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर तथास्तु कहा।
ब्रह्मा जी ने शंखचूर्ण को दिव्य श्री कृष्ण कवच प्रदान किया ब्रह्मा जी ने शंखचूर्ण को आज्ञा दी कि वह बद्री वन को जाए जहां पर धर्म ध्वज की कन्या तुलसी सकाम भाव से तपस्या कर रही है ब्रह्मा जी ने शंखचूड़ को तुलसी से विवाह करने की आज्ञा दी।
वहीं तुलसी धर्मध्वज जो कि माता लक्ष्मी के परम भक्त थे की कन्या थी। तुलसी पूर्वजन्म में विराजा नाम की एक गोपिका थी जिसे राधा जी के श्राप के कारण पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा था। जन्म के बाद से ही तुलसी के मन में नारायण को प्राप्त करने की उत्कंठा थी।
(स्वर्ग के गोलोक में सुदामा और विराजा निवास करती थी। सुदामा विराजा से प्रेम करता था लेकिन विराजा श्री कृष्ण से प्रेम करती थी, एक बार जब विराजा और कृष्ण प्रेम में लीन थे, तो स्वयं राधा वहां प्रकट हो गईं। और राधा ने विराजा को श्रीकृष्ण के साथ देख कर विराजा को गोलोक से पृथ्वी पर निवास करने का श्राप दे दिया और किसी कारणवश राधा जी ने सुदामा को भी पृथ्वी पर निवास करने का श्राप दे दिया। जिससे उन्हे स्वर्ग से पृथ्वी पर आना पड़ा। मृत्यु के पश्चात सुदामा का जन्म राक्षस राजदम्ब के यहां शंखचूर्ण के रूप में हुआ और विराजा का जन्म धर्मध्वज के यहां तुलसी के रूप में हुआ।)
इसलिए नारायण की प्राप्ति हेतु उसने ब्रह्मा जी की तपस्या प्रारम्भ की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे दर्शन दिए और उसे आज्ञा दी कि वह दानव राज शंखचूर्ण से विवाह कर ले तब ही उसे नारायण की प्राप्ति हो सकती है।
इस प्रकार धर्मध्वज की कन्या तुलसी और दानव राज शंख चूर्ण का विवाह संपन्न हुआ विवाह के पश्चात शंख चूर्ण अपने घर लौट कर आया तो उसे दानवों का अधिपति बना दिया गया।
दानवों का अधिपति बनने के पश्चात राज्य विस्तार की कामना से शंखचूर्ण में देवताओं पर आक्रमण कर कर उनका संघार करना आरंभ कर दिया
उसने समस्त देवलोक पर अपना अधिकार प्राप्त कर लिया तब सारे देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हें सारी कथा सुनाई तब भगवान विष्णु हंसकर बोले शंख चूर्ण मेरा परम भक्त सुदामा गोप है जिसने राधा के श्राप वश दानव कुल में जन्म लिया है। भगवान शंकर द्वारा उसका वध पूर्व निर्धारित है तब सारे देवता मिलकर भगवान शिव के पास जाकर उनसे शंखचूड़ के वध की प्रार्थना करते हैं।
भगवान शिव शंखचूर्ण से युद्ध करते हैं परंतु जब तक शंखचूर्ण के पास ब्रह्मा जी द्वारा दिया हुआ दिव्य श्रीकृष्ण कवच था और जब तक उसकी पतिव्रता पत्नी तुलसी का सतीत्व अखंडित रहता तब तक वह शंखचूर्ण का वध नहीं कर सकते थे।
अतः भगवान विष्णु एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धरकर शंखचूर्ण के पास भिक्षा मांगने जाते हैं और शंख चूर्ण से वचन लेते हैं कि जब वह भिक्षा देने का वचन देगा तभी वह क्या भिक्षा चाहिए अन्यथा नहीं बताएगा। अतः शंखचूर्ण उसे वचन दे देता है।
वह वृद्ध ब्राह्मण भिक्षा में वह दिव्य कवच मांग लेता है जिसे शंखचूर्ण उसे दे देता है। इसके पश्चात भगवान विष्णु शंखचूर्ण का रूप धारण करके तुलसी के पास पहुंचे जहाँ पर तुलसी ने उन्हें अपना पति शंखचूर्ण समझकर उनका पूजन किया बातें की और रमण किया। तभी उनके रूप से तुलसी को यह एहसास हो गया कि यह उनका पति नहीं अपितु कोई और है।
उधर जैसे ही विष्णु जी तुलसी के सतीत्व को नष्ट करते है शिव जी अपने त्रिशूल द्वारा उसका वध कर देते हैं। वध के पश्चात् उसे श्राप से मुक्ति मिल जाती है और उसे पहले की भांति श्री कृष्ण के पार्षद रूप की प्राप्ति हो जाती है और उसके शरीर की राख से शंख जाति का प्रादुर्भाव हुआ जिस शंख का जल शंकर जी अतिरिक्त अन्य सभी देवताओं के लिए प्रशस्त माना जाता है।
तब तुलसी ने क्रोधित होकर पूछा कि तू कौन है जिसने मेरे सतीत्व को नष्ट कर दिया। तब भगवान विष्णु उसके समक्ष अपने असली रूप को प्रकट करते है। तब तुलसी क्रोधित होकर भगवान विष्णु को यह श्राप देती है कि जिस प्रकार से आपका ह्रदय पाषाण का हो गया है आप भी पाषाण में बदल जाएं।
तब भगवान शिव उसके समक्ष प्रकट होकर उसे समझाते है कि तुमने जिस मनोरथ को लेकर तप किया था वह भला अन्यथा कैसे जा सकता है। यह उसी तपस्या का फल है। अब तुम दिव्य देह धारण कर लक्ष्मी जी के समान वैकुण्ठ में विहार करती रहो।
तुम्हारा यह शरीर प्राण त्यागने के पश्चात् नदी के रूप में परिवर्तित हो जायेगा। वह नदी भारतवर्ष में पुण्यरूपा गंडकी के नाम से प्रसिद्ध होगी। कुछ काल के पश्चात् मेरे वर के प्रभाव से देव पूजन सामग्री में तुलसी का प्रधान स्थान हो जायेगा। तुम स्वर्गलोक में,मृत्युलोक में तथा पाताललोक में सदा ही श्री हरि के निकट निवास करोगी और पवित्र तुलसी का वृक्ष बन जाओगी।
उधर जो तुम्हारा नदी रूप होगा वह पुण्य प्रदान करने वाला होगा और वह श्री हरि के अंशभूत लवणसागर की पत्नी बनेगा। तथा श्रीहरि भी तुम्हारे श्रापवश पत्थर का रूप धारण कर भारत में गण्डकी नदी के जल में निवास करेंगे। वहाँ तीखी दाढ़ वाले कीड़े पत्थर को काटकर उसमें शंख की आकृति बनाएंगे। उसके भेद से वह अत्यंत पुण्य प्रदान करने वाली शालिग्राम शिला कहलाएगी।
उसे लक्ष्मीनारायण के नाम से भी जाना जायेगा। विष्णु जी की शालिग्राम शिला और वृक्षस्वरूपणी तुलसी का समागम सदा अनुकूल तथा बहुत प्रकार के पुण्यों की वृद्धि करने वाला होगा।
जो व्यक्ति शालिग्राम शिला के ऊपर से तुलसीपत्र को दूर करेगा उसे पत्नीवियोग सहना पड़ेगा और जो शंख को दूर करके तुलसी पत्र को हटायेगा उसे भी भार्याहीन होना पड़ेगा। जो लोग शालिग्राम शिला,तुलसी और शंख को एकत्रित करके उनकी रक्षा करते हैं वे सदैव ही श्री हरि को प्यारे होते हैं।
Tulsi Ka Mahatva
तुलसी के पौधे का ज्योतिषीय महत्व
तुलसी के पौधे का सनातन धर्म में विशेष महत्व है। जहाँ कहीं भी तुलसी का पौधा लगा होता है वहाँ पर सकारात्मक ऊर्जा होती है तथा तुलसी के पौधे लगाने से बहुत बड़े-बड़े वास्तु सम्बन्धी दोष नष्ट हो जाते है। ज्योतिष शास्त्र में तुलसी के पौधे को बुध ग्रह से जोड़कर देखा जाता है। अतः यदि कुंडली में बुध कमजोर हो तो तुलसी और भगवान श्री कृष्ण की पूजा करें और भगवान श्री कृष्ण को तुलसी पत्र अर्पित करें। यदि किसी बच्चे में कंसंट्रेशन की कमी हो तो उसे सफ़ेद या लाल धागे में तुलसी की जड़ रविवार के दिन पहनाएं।
Tulsi Ji Ki Aarti-तुलसी जी की आरती
वैसे तो सम्पूर्ण कार्तिक मास में तुलसी जी की आरती करनी चाहिए। परन्तु Tulsi Vivah के पश्चात तुलसी जी की आरती अवश्य करें।
जय जय तुलसी माता,मैया जय तुलसी माता । सब जग की सुख दाता,सबकी वर माता ॥ जय जय तुलसी माता……..
सब योगों से ऊपर,सब रोगों से ऊपर । रज से रक्षा करके,सबकी भव त्राता ॥ जय जय तुलसी माता……..
बटु पुत्री है श्यामा,सुर बल्ली हे ग्राम्या । विष्णुप्रिये जो तुमको सेवे,सो नर तर जाता जय जय तुलसी माता……..
हरि के शीश विराजत,त्रिभुवन से हो वन्दित। पतित जनों की तारिणी,तुम हो विख्याता। जय जय तुलसी माता……..
लेकर जन्म विजन में,आई दिव्य भवन में । मानव लोक तुम्हीं से,सुख-संपति पाता ॥ जय जय तुलसी माता……..
हरि को तुम अति प्यारी,श्याम वर्ण सुकुमारी । प्रेम अजब है उनका,तुमसे कैसा नाता ॥ हमारी विपद हरो तुम,कृपा करो माता ॥ जय जय तुलसी माता……..
जय जय तुलसी माता,मैया जय तुलसी माता । सब जग की सुख दाता,सबकी वर माता ॥ जय जय तुलसी माता……..
देव गुरु बृहस्पति को बुद्धि और शिक्षा का कारक माना जाता है। गुरुवार को बृहस्पति देव की पूजा करने से धन, विद्या, मान-सम्मान, प्रतिष्ठा और कई अन्य मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। बृहस्पति ग्रह को जीवन में स्थायित्व से जोड़कर देखा जाता है। कन्याओं के लिए यह सुखी वैवाहिक जीवन और संतान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अतः विवाहित महिलाओं और अविवाहित कन्याओं को भी यह व्रत रखना चाहिए।
इस दिन प्रातः उठकर स्नान आदि करने के पश्चात व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पीले वस्त्र धारण करने चाहिए तथा चना दाल और गुड़ से बृहस्पति देव और केले की जड़ का पूजन करना चाहिए। सायं काल पूजन के पश्चात पीला भोजन करना चाहिए। बृहस्पतिवार की व्रत कथा(Brihaspativar Ki Katha) निम्न है।
Brihaspativar Ki Katha Mahatmy-बृहस्पतिवार व्रत कथा महात्मय
भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानी राजा राज्य करता था। वह नित्य गरीबों और ब्राह्मणों की सहायता करता था। यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न ही गरीबों को दान देती, न ही भगवान का पूजन करती थी और राजा को भी दान देने से मना किया करती थी।(Brihaspativar Ki Katha)
एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे, तो रानी महल में अकेली थी। उसी समय बृहस्पतिदेव साधु वेष में राजा के महल में भिक्षा के लिए गए और भिक्षा माँगी रानी ने भिक्षा देने से इन्कार किया और कहा: हे साधु महाराज मैं तो दान पुण्य से तंग आ गई हूँ। मेरा पति सारा धन लुटाते रहिते हैं। मेरी इच्छा है कि हमारा धन नष्ट हो जाए फिर न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।
साधु ने कहा: देवी तुम तो बड़ी विचित्र हो। धन, सन्तान तो सभी चाहते हैं। पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर भी होने चाहिए। यदि तुम्हारे पास अधिक धन है तो भूखों को भोजन दो, प्यासों के लिए प्याऊ बनवाओ, मुसाफिरों के लिए धर्मशालाएं खुलवाओ। जो निर्धन अपनी कुंवारी कन्याओं का विवाह नहीं कर सकते उनका विवाह करा दो। ऐसे और कई काम हैं जिनके करने से तुम्हारा यश लोक-परलोक में फैलेगा।
परन्तु रानी पर उपदेश का कोई प्रभाव न पड़ा। वह बोली: महाराज आप मुझे कुछ न समझाएं। मैं ऐसा धन नहीं चाहती जो हर जगह बाँटती फिरूं।
साधु ने उत्तर दिया यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तथास्तु! तुम ऐसा करना कि बृहस्पतिवार को घर लीपकर पीली मिट्टी से अपना सिर धोकर स्नान करना, भट्टी चढ़ाकर कपड़े धोना, ऐसा करने से आपका सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर वह साधु महाराज वहाँ से आलोप हो गये।
साधु के अनुसार कही बातों को पूरा करते हुए रानी को केवल तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे, कि उसकी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई। भोजन के लिए राजा का परिवार तरसने लगा।
तब एक दिन राजा ने रानी से बोला कि हे रानी, तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूँ, क्योंकि यहाँ पर सभी लोग मुझे जानते हैं। इसलिए मैं कोई छोटा कार्य नहीं कर सकता। ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया। वहाँ वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा। इधर, राजा के परदेश जाते ही रानी और दासी दुःखी रहने लगी।
एक बार जब रानी और दासी को सात दिन तक बिना भोजन के रहना पड़ा, तो रानी ने अपनी दासी से कहा: हे दासी! पास ही के नगर में मेरी बहिन रहती है। वह बड़ी धनवान है। तू उसके पास जा और कुछ ले आ, ताकि थोड़ी-बहुत गुजर-बसर हो जाए। दासी रानी की बहिन के पास गई।
उस दिन गुरुवार था और रानी की बहिन उस समय बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुन रही थी। दासी ने रानी की बहिन को अपनी रानी का संदेश दिया, लेकिन रानी की बड़ी बहिन ने कोई उत्तर नहीं दिया। जब दासी को रानी की बहिन से कोई उत्तर नहीं मिला तो वह बहुत दुःखी हुई और उसे क्रोध भी आया। दासी ने वापस आकर रानी को सारी बात बता दी। सुनकर रानी ने अपने भाग्य को कोसा।
उधर, रानी की बहिन ने सोचा कि मेरी बहिन की दासी आई थी, परंतु मैं उससे नहीं बोली, इससे वह बहुत दुःखी हुई होगी।
कथा सुनकर और पूजन समाप्त करके वह अपनी बहिन के घर आई और कहने लगी: हे बहिन! मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी। तुम्हारी दासी मेरे घर आई थी परंतु जब तक कथा होती है, तब तक न तो उठते हैं और न ही बोलते हैं, इसलिए मैं नहीं बोली। कहो दासी क्यों गई थी?
रानी बोली: बहिन, तुमसे क्या छिपाऊं, हमारे घर में खाने तक को अनाज नहीं था। ऐसा कहते-कहते रानी की आंखें भर आई। उसने दासी समेत पिछले सात दिनों से भूखे रहने तक की बात अपनी बहिन को विस्तार पूर्वक सुना दी।
रानी की बहिन बोली: देखो बहिन! भगवान बृहस्पतिदेव सबकी मनोकामना को पूर्ण करते हैं। देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो।
पहले तो रानी को विश्वास नहीं हुआ पर बहिन के आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को अंदर भेजा तो उसे सचमुच अनाज से भरा एक घड़ा मिल गया। यह देखकर दासी को बड़ी हैरानी हुई।
दासी रानी से कहने लगी: हे रानी! जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाए, ताकि हम भी व्रत कर सकें। तब रानी ने अपनी बहिन से बृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा।
उसकी बहिन ने बताया, बृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं, व्रत कथा सुनें और पीला भोजन ही करें। इससे बृहस्पतिदेव प्रसन्न होते हैं। व्रत और पूजन विधि बताकर रानी की बहिन अपने घर को लौट गई।
सात दिन के बाद जब गुरुवार आया, तो रानी और दासी ने व्रत रखा। घुड़साल में जाकर चना और गुड़ लेकर आईं। फिर उससे केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया। अब पीला भोजन कहाँ से आए इस बात को लेकर दोनों बहुत दुःखी थे।
चूंकि उन्होंने व्रत रखा था, इसलिए बृहस्पतिदेव उनसे प्रसन्न थे। इसलिए वे एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर दो थालों में सुन्दर पीला भोजन दासी को दे गए। भोजन पाकर दासी प्रसन्न हुई और फिर रानी के साथ मिलकर भोजन ग्रहण किया।
उसके बाद वे सभी गुरुवार को व्रत और पूजन करने लगी। बृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास फिर से धन-संपत्ति आ गई, परंतु रानी फिर से पहले की तरह आलस्य करने लगी। तब दासी बोली: देखो रानी! तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी, तुम्हें धन रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया और अब जब भगवान बृहस्पति की कृपा से धन मिला है तो तुम्हें फिर से आलस्य होता है।
रानी को समझाते हुए दासी कहती है कि बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए, भूखे मनुष्यों को भोजन कराना चाहिए, और धन को शुभ कार्यों में खर्च करना चाहिए, जिससे तुम्हारे कुल का यश बढ़ेगा, स्वर्ग की प्राप्ति होगी और पित्र प्रसन्न होंगे। दासी की बात मानकर रानी अपना धन शुभ कार्यों में खर्च करने लगी, जिससे पूरे नगर में उसका यश फैलने लगा।
बृहस्पतिवार व्रत कथा के बाद श्रद्धा के साथ आरती की जानी चाहिए। इसके बाद प्रसाद बांटकर उसे ग्रहण करना चाहिए।
एक दिन राजा दुःखी होकर जंगल में एक पेड़ के नीचे आसन जमाकर बैठ गया। वह अपनी दशा को याद करके व्याकुल होने लगा। बृहस्पतिवार का दिन था, एकाएक उसने देखा कि निर्जन वन में एक साधु प्रकट हुए। वह साधु वेष में स्वयं बृहस्पति देवता थे।
लकड़हारे के सामने आकर बोले: हे लकड़हारे! इस सुनसान जंगल में तू चिन्ता मग्न क्यों बैठा है? लकड़हारे ने दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और उत्तर दिया: महात्मा जी! आप सब कुछ जानते हैं, मैं क्या कहूँ। यह कहकर रोने लगा और साधु को अपनी आत्मकथा सुनाई।
महात्मा जी ने कहा: तुम्हारी स्त्री ने बृहस्पति के दिन बृहस्पति भगवान का निरादर किया है जिसके कारण रुष्ट होकर उन्होंने तुम्हारी यह दशा कर दी। अब तुम चिन्ता को दूर करके मेरे कहने पर चलो तो तुम्हारे सब कष्ट दूर हो जायेंगे और भगवान पहले से भी अधिक सम्पत्ति देंगे।
तुम बृहस्पति के दिन कथा किया करो। दो पैसे के चने मुनक्का लाकर उसका प्रसाद बनाओ और शुद्ध जल से लोटे में शक्कर मिलाकर अमृत तैयार करो। कथा के पश्चात अपने सारे परिवार और सुनने वाले प्रेमियों में अमृत व प्रसाद बांटकर आप भी ग्रहण करो। ऐसा करने से भगवान तुम्हारी सब मनोकामनाएँ पूरी करेंगे।
साधु के ऐसे वचन सुनकर लकड़हारा बोला: हे प्रभो! मुझे लकड़ी बेचकर इतना पैसा नहीं मिलता, जिससे भोजन के उपरान्त कुछ बचा सकूं। मैंने रात्रि में अपनी स्त्री को व्याकुल देखा है। मेरे पास कुछ भी नहीं जिससे मैं उसकी खबर मंगा सकूं।
साधु ने कहा: हे लकड़हारे! तुम किसी बात की चिन्ता मत करो। बृहस्पति के दिन तुम रोजाना की तरह लकड़ियाँ लेकर शहर को जाओ। तुमको रोज से दुगुना धन प्राप्त होगा, जिससे तुम भली-भांति भोजन कर लोगे तथा बृहस्पतिदेव की पूजा का सामान भी आ जायेगा।
इतना कहकर साधु अन्तर्ध्यान हो गए। धीरे-धीरे समय व्यतीत होने पर फिर वही बृहस्पतिवार का दिन आया। लकड़हारा जंगल से लकड़ी काटकर किसी शहर में बेचने गया, उसे उस दिन और दिन से अधिक पैसा मिला। राजा ने चना गुड आदि लाकर गुरुवार का व्रत किया। उस दिन से उसके सभी क्लेश दूर हुए, परन्तु जब दुबारा गुरुवार का दिन आया तो बृहस्पतिवार का व्रत करना भूल गया। इस कारण बृहस्पति भगवान नाराज हो गए।
उस दिन उस नगर के राजा ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया तथा शहर में यह घोषणा करा दी कि कोई भी मनुष्य अपने घर में भोजन न बनावे न आग जलावे समस्त जनता मेरे यहाँ भोजन करने आवे। इस आज्ञा को जो न मानेगा उसे फाँसी की सजा दी जाएगी। इस तरह की घोषणा सम्पूर्ण नगर में करवा दी गई।
राजा की आज्ञानुसार शहर के सभी लोग भोजन करने गए। लेकिन लकड़हारा कुछ देर से पहुँचा इसलिए राजा उसको अपने साथ घर लिवा ले गए और ले जाकर भोजन करा रहे थे तो रानी की दृष्टि उस खूंटी पर पड़ी जिस पर उसका हार लटका हुआ था। वह वहाँ पर दिखाई नहीं दिया। रानी ने निश्चय किया कि मेरा हार इस मनुष्य ने चुरा लिया है। उसी समय सिपाहियों को बुलाकर उसको कारागार में डलवा दिया।
जब लकड़हारा कारागार में पड़ गया और बहुत दुःखी होकर विचार करने लगा कि न जाने कौन से पूर्व जन्म के कर्म से मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ है, और उसी साधु को याद करने लगा जो कि जंगल में मिला था।
उसी समय तत्काल बृहस्पतिदेव साधु के रूप में प्रकट हुए और उसकी दशा को देखकर कहने लगे: अरे मूर्ख! तूने बृहस्पतिदेव की कथा नहीं करी इस कारण तुझे दुःख प्राप्त हुआ है। अब चिन्ता मत कर बृहस्पतिवार के दिन कारागार के दरवाजे पर चार पैसे पड़े मिलेंगे। उनसे तू बृहस्पतिदेव की पूजा करना तेरे सभी कष्ट दूर हो जायेंगे।
बृहस्पति के दिन उसे चार पैसे मिले। लकड़हारे ने कथा कही उसी रात्रि को बृहस्पतिदेव ने उस नगर के राजा को स्वप्न में कहा: हे राजा! तूमने जिस आदमी को कारागार में बन्द कर दिया है वह निर्दोष है। वह राजा है उसे छोड़ देना। रानी का हार उसी खूंटी पर लटका है। अगर तू ऐसा नही करेगा तो मैं तेरे राज्य को नष्ट कर दूंगा।
इस तरह रात्रि के स्वप्न को देखकर राजा प्रातःकाल उठा और खूंटी पर हार देखकर लकड़हारे को बुलाकर क्षमा मांगी तथा लकड़हारे को योग्य सुन्दर वस्त्र-आभूषण देकर विदा कर दिया। बृहस्पतिदेव की आज्ञानुसार लकड़हारा अपने नगर को चल दिया।
राजा जब अपने नगर के निकट पहुँचा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। नगर में पहले से अधिक बाग, तालाब, कुएं तथा बहुत सी धर्मशाला मन्दिर आदि बन गई हैं। राजा ने पूछा यह किसका बाग और धर्मशाला हैं, तब नगर के सब लोग कहने लगे यह सब रानी और बांदी के हैं। तो राजा को आश्चर्य हुआ और गुस्सा भी आया।
जब रानी ने यह खबर सुनी कि राजा आरहे हैं, तो उन्होंने बाँदी से कहा कि: हे दासी! देख राजा हमको कितनी बुरी हालत में छोड़ गए थे। हमारी ऐसी हालत देखकर वह लौट न जायें, इसलिए तू दरवाजे पर खड़ी होजा। आज्ञानुसार दासी दरवाजे पर खड़ी हो गई। राजा आए तो उन्हें अपने साथ लिवा लाई। तब राजा ने क्रोध करके अपनी रानी से पूछा कि यह धन तुम्हें कैसे प्राप्त हुआ है, तब उन्होंने कहा: हमें यह सब धन बृहस्पतिदेव के इस व्रत के प्रभाव से प्राप्त हुआ है।
राजा ने निश्चय किया कि सात रोज बाद तो सभी बृहस्पतिदेव का पूजन करते हैं परन्तु मैं प्रतिदिन दिन में तीन बार कहानी(Brihaspativar Ki Katha) तथा रोज व्रत किया करूँगा। अब हर समय राजा के दुपट्टे में चने की दाल बँधी रहती तथा दिन में तीन बार कहानी कहता।
एक रोज राजा ने विचार किया कि चलो अपनी बहिन के यहाँ हो आवें। इस तरह निश्चय कर राजा घोड़े पर सवार हो अपनी बहिन के यहाँ को चलने लगा। मार्ग में उसने देखा कि कुछ आदमी एक मुर्दे को लिए जा रहे हैं, उन्हें रोककर राजा कहने लगा: अरे भाइयों! मेरी बृहस्पतिदेव की कथा सुन लो।
वे बोले: लो! हमारा तो आदमी मर गया है, इसको अपनी कथा की पड़ी है। परन्तु कुछ आदमी बोले: अच्छा कहो हम तुम्हारी कथा भी सुनेंगे। राजा ने दाल निकाली और जब कथा आधी हुई थी कि मुर्दा हिलने लग गया और जब कथा समाप्त हो गई तो राम-राम करके मनुष्य उठकर खड़ा हो गया।
आगे मार्ग में उसे एक किसान खेत में हल चलाता मिला। राजा ने उसे देख और उससे बोले: अरे भईया! तुम मेरी बृहस्पतिवार की कथा (Brihaspativar Ki Katha)सुन लो। किसान बोला जब तक मैं तेरी कथा सुनूंगा तब तक चार हरैया जोत लूंगा। जा अपनी कथा किसी और को सुनाना। इस तरह राजा आगे चलने लगा। राजा के हटते ही बैल पछाड़ खाकर गिर गए तथा किसान के पेट में बड़ी जोर का दर्द होने लगा।
उस समय उसकी माँ रोटी लेकर आई, उसने जब यह देखा तो अपने पुत्र से सब हाल पूछा और बेटे ने सभी हाल कह दिया तो बुढ़िया दौड़ी-दौड़ी उस घुड़सवार के पास गई और उससे बोली कि मैं तेरी कथा सुनूंगी तू अपनी कथा मेरे खेत पर चलकर ही कहना। राजा ने बुढ़िया के खेत पर जाकर कथा कही, जिसके सुनते ही वह बैल उठ खड़ हुए तथा किसान के पेट का दर्द भी बन्द हो गया।
राजा अपनी बहिन के घर पहुँचा। बहिन ने भाई की खूब मेहमानी की। दूसरे रोज प्रातःकाल राजा जगा तो वह देखने लगा कि सब लोग भोजन कर रहे हैं।
राजा ने अपनी बहिन से कहा: ऐसा कोई मनुष्य है जिसने भोजन नहीं किया हो, मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन ले।
बहिन बोली: हे भैया! यह देश ऐसा ही है कि पहले यहाँ लोग भोजन करते हैं, बाद में अन्य काम करते हैं। अगर कोई पड़ोस में हो तो देख आउं।
वह ऐसा कहकर देखने चली गई परन्तु उसे कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसने भोजन न किया हो अतः वह एक कुम्हार के घर गई जिसका लड़का बीमार था। उसे मालूम हुआ कि उनके यहाँ तीन रोज से किसी ने भोजन नहीं किया है। रानी ने अपने भाई की कथा सुनने के लिए कुम्हार से कहा वह तैयार हो गया। राजा ने जाकर बृहस्पतिवार की कथा कही जिसको सुनकर उसका लड़का ठीक होगया, अब तो राजा की प्रशंसा होने लगी।
एक रोज राजा ने अपनी बहिन से कहा कि हे बहिन! हम अपने घर को जायेंगे। तुम भी तैयार हो जाओ। राजा की बहिन ने अपनी सास से कहा। सास ने कहा हाँ चली जा। परन्तु अपने लड़कों को मत ले जाना क्योंकि तेरे भाई के कोई औलाद नहीं है।
बहिन ने अपने भईया से कहा: हे भईया! मैं तो चलूंगी पर कोई बालक नहीं जाएगा। राजा बोला: जब कोई बालक नहीं चलेगा, तब तुम ही क्या करोगी।
बड़े दुःखी मन से राजा अपने नगर को लौट आया। राजा ने अपनी रानी से कहा: हम निरवंशी हैं। हमारा मुंह देखने का धर्म नहीं है और कुछ भोजन आदि नहीं किया।
रानी बोली: हे प्रभो! बृहस्पतिदेव ने हमें सब कुछ दिया है, वह हमें औलाद अवश्य देंगे।
उसी रात को बृहस्पतिदेव ने राजा से स्वप्न में कहा: हे राजा उठ। सभी सोच त्याग दे, तेरी रानी गर्भ से है। राजा की यह बात सुनकर बड़ी खुशी हुई।
नवें महीने में उसके गर्भ से एक सुन्दर पुत्र पैदा हुआ। तब राजा बोला: हे रानी! स्त्री बिना भोजन के रह सकती है, पर बिना कहे नहीं रह सकती। जब मेरी बहिन आवे तुम उससे कुछ कहना मत। रानी ने सुनकर हाँ कर दिया।
जब राजा की बहिन ने यह शुभ समाचार सुना तो वह बहुत खुश हुई तथा बधाई लेकर अपने भाई के यहाँ आई, तभी रानी ने कहा: घोड़ा चढ़कर तो नहीं आई, गधा चढ़ी आई।
राजा की बहिन बोली: भाभी मैं इस प्रकार न कहती तो तुम्हें औलाद कैसे मिलती।
बृहस्पतिदेव ऐसे ही हैं, जैसी जिसके मन में कामनाएँ हैं, सभी को पूर्ण करते हैं, जो सदभावनापूर्वक बृहस्पतिवार का व्रत करता है एवं कथा(Brihaspativar Ki Katha) पढता है, अथवा सुनता है, दूसरो को सुनाता है, बृहस्पतिदेव उसकी सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं।भगवान बृहस्पतिदेव उसकी सदैव रक्षा करते हैं, संसार में जो मनुष्य सदभावना से भगवान जी का पूजन व्रत सच्चे हृदय से करते हैं, तो उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते है।
जैसी सच्ची भावना से रानी और राजा ने उनकी कथा का गुणगान किया तो उनकी सभी इच्छायें बृहस्पतिदेव जी ने पूर्ण की थीं। इसलिए पूर्ण कथा सुनने के बाद प्रसाद लेकर जाना चाहिए। हृदय से उसका मनन करते हुए जयकारा बोलना चाहिए।
Brihaspativar Ki Katha Video
॥ बृहस्पतिदेव की जय। विष्णु भगवान की जय ॥
Brihaspativar Ki Katha- बृहस्पतिदेव की कथा
प्राचीन काल में एक ब्राह्मण रहता था, वह बहुत निर्धन था। उसके कोई सन्तान नहीं थी। उसकी स्त्री बहुत मलीनता के साथ रहती थी। वह स्नान न करती, किसी देवता का पूजन न करती, इससे ब्राह्मण देवता बड़े दुःखी थे। बेचारे बहुत कुछ कहते थे किन्तु उसका कुछ परिणाम न निकला।
भगवान की कृपा से ब्राह्मण की स्त्री के कन्या रूपी रत्न पैदा हुआ। कन्या बड़ी होने पर प्रातः स्नान करके विष्णु भगवान का जाप व बृहस्पतिवार का व्रत करने लगी। अपने पूजन-पाठ को समाप्त करके विद्यालय जाती तो अपनी मुट्ठी में जौ भरके ले जाती और पाठशाला के मार्ग में डालती जाती। तब ये जौ स्वर्ण के जो जाते लौटते समय उनको बीन कर घर ले आती थी।
एक दिन वह बालिका सूप में उस सोने के जौ को फटककर साफ कर रही थी कि उसके पिता ने देख लिया और कहा – हे बेटी! सोने के जौ के लिए सोने का सूप होना चाहिए। दूसरे दिन बृहस्पतिवार था इस कन्या ने व्रत रखा और बृहस्पतिदेव से प्रार्थना करके कहा- मैंने आपकी पूजा सच्चे मन से की हो तो मेरे लिए सोने का सूप दे दो।
बृहस्पतिदेव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। रोजाना की तरह वह कन्या जौ फैलाती हुई जाने लगी जब लौटकर जौ बीन रही थी तो बृहस्पतिदेव की कृपा से सोने का सूप मिला। उसे वह घर ले आई और उसमें जौ साफ करने लगी। परन्तु उसकी मां का वही ढंग रहा।
एक दिन की बात है कि वह कन्या सोने के सूप में जौ साफ कर रही थी। उस समय उस शहर का राजपुत्र वहां से होकर निकला। इस कन्या के रूप और कार्य को देखकर मोहित हो गया तथा अपने घर आकर भोजन तथा जल त्याग कर उदास होकर लेट गया। राजा को इस बात का पता लगा तो अपने प्रधानमंत्री के साथ उसके पास गए और बोले- हे बेटा तुम्हें किस बात का कष्ट है? किसी ने अपमान किया है अथवा और कारण हो सो कहो मैं वही कार्य करूंगा जिससे तुम्हें प्रसन्नता हो।
अपने पिता की राजकुमार ने बातें सुनी तो वह बोला- मुझे आपकी कृपा से किसी बात का दुःख नहीं है किसी ने मेरा अपमान नहीं किया है परन्तु मैं उस लड़की से विवाह करना चाहता हूं जो सोने के सूप में जौ साफ कर रही थी। यह सुनकर राजा आश्चर्य में पड़ गया और बोला- हे बेटा! इस तरह की कन्या का पता तुम्हीं लगाओ। मैं उसके साथ तेरा विवाह अवश्य ही करवा दूंगा।
राजकुमार ने उस लड की के घर का पता बतलाया। तब मंत्री उस लड की के घर गए और ब्राह्मण देवता को सभी हाल बतलाया। ब्राह्मण देवता राजकुमार के साथ अपनी कन्या का विवाह करने के लिए तैयार हो गए तथा विधि-विधान के अनुसार ब्राह्मण की कन्या का विवाह राजकुमार के साथ हो गया।
कन्या के घर से जाते ही पहले की भांति उस ब्राह्मण देवता के घर में गरीबी का निवास हो गया। अब भोजन के लिए भी अन्न बड़ी मुश्किल से मिलता था। एक दिन दुःखी होकर ब्राह्मण देवता अपनी पुत्री के पास गए। बेटी ने पिता की दुःखी अवस्था को देखा और अपनी मां का हाल पूछा। तब ब्राह्मण ने सभी हाल कहा। कन्या ने बहुत सा धन देकर अपने पिता को विदा कर दिया। इस तरह ब्राह्मण का कुछ समय सुखपूर्वक व्यतीत हुआ। कुछ दिन बाद फिर वही हाल हो गया।
ब्राह्मण फिर अपनी कन्या के यहां गया और सारा हाल कहा तो लडकी बोली- हे पिताजी! आप माताजी को यहां लिवा लाओ। मैं उसे विधि बता दूंगी जिससे गरीबी दूर हो जाए। वह ब्राह्मण देवता अपनी स्त्री को साथ लेकर पहुंचे तो अपनी मां को समझाने लगी- हे मां तुम प्रातःकाल प्रथम स्नानादि करके विष्णु भगवान का पूजन करो तो सब दरिद्रता दूर हो जावेगी।
परन्तु उसकी मांग ने एक भी बात नहीं मानी और प्रातःकाल उठकर अपनी पुत्री के बच्चों की जूठन को खा लिया। इससे उसकी पुत्री को भी बहुत गुस्सा आया और एक रात को कोठरी से सभी सामान निकाल दिया और अपनी मां को उसमें बंद कर दिया।
प्रातःकाल उसे निकाला तथा स्नानादि कराके पाठ करवाया तो उसकी मां की बुद्धि ठीक हो गई और फिर प्रत्येक बृहस्पतिवार को व्रत रखने लगी। इस व्रत के प्रभाव से उसके मां बाप बहुत ही धनवान और पुत्रवान हो गए और बृहस्पतिजी के प्रभाव से इस लोक के सुख भोगकर स्वर्ग को प्राप्त हुए।
सब बोलो विष्णु भगवान की जय। बोलो बृहस्पति देव की जय॥
Nag Panchami हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहारों में से है। हिन्दू पंचांग के अनुसार सावन माह की कृष्ण पक्ष के पंचमी को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता या सर्प की पूजा की जाती है और उन्हें दूध से स्नान कराया जाता है।
श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पंचमी कहते हैं। इस दिन नागों की पूजा की जाती है। गरुण पुराण में ऐसा कहा गया है कि नाग पंचमी(Nag Panchami) के दिन घर के दोनों बगल में नाग देवता की मूर्ति खींचकर अनन्तर प्रमुख महानागों का पूजन किया जाना चाहिए।
पंचमी नागों की तिथि है ,ज्योतिष के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग हैं। इसलिए शेष आदि सर्पराजों का पूजन पंचमी को होना चाहिए। सुंगंधित पुष्प तथा दूध सर्पों को अति प्रिय हैं। गाँवो में इस दिन को नागचैयां भी कहते हैं। इस दिन ग्रामीण लड़कियां किसी जलाशय में गुड़ियों का विसर्जन करती हैं। ग्रामीण बच्चे तैरती हुई इन निर्जीव गुड़ियों को पीटते हैं। तत्पश्चात बहन उन्हें रुपयों की भेंट तथा आशीर्वाद देती हैं।
Nag Panchami Tithi Aur Puja Muhurt-नाग पंचमी तिथि और पूजा का मुहूर्त
नाग पञ्चमी सोमवार, 29जुलाई, 2023 नाग पञ्चमी पूजा मूहूर्त – 05:29 ए एम से 08:11 ए एम अवधि – 02 घण्टे 42 मिनट्स
पञ्चमी तिथि प्रारम्भ – 28 जुलाई, 2023 को 11:24 पी एम पञ्चमी तिथि समाप्त – 29 जुलाई , 2023 को 12:46 पी एम
Nag Panchami Katha-नाग पंचमी कथा
प्राचीन काल की दन्त कथाओं से ज्ञात होता है कि किसी ब्राह्मण की सात पुत्रवधुयें थीं। सावन मास लगते ही छः बहुएं तो भाई के साथ मायके चली गईं परन्तु सातवीं बहु का कोई भाई ही न था तो बुलाने कौन आता। बेचारी ने अति दुःखी होकर पृथ्वी को धारण करने वाले शेष नाग को भाई रूप में याद किया।
करुणा युक्त दीन वाणी सुनकर शेष जी वृद्ध ब्राह्मण के रूप में आये और उसे लिवाकर चल दिये। थोड़ी दूर रास्ता तय करने पर उन्होंने अपना असली रूप धारण कर लिया। तब फन पर बैठा कर नागलोक ले गये। वहाँ वह निश्चिन्त होकर रहने लगी। पाताल -लोक में जब वह निवास कर रही थी उसी समय शेष जी की कुल परम्परा में नागों के बहुत से बच्चों ने जन्म लिया।
उन नाग बच्चों को सर्वत विचरण करते देख शेष -नागरानी ने उस वधू को पीतल का एक दीपक दिया तथा बताया कि इसके प्रकाश से तुम अँधेरे में भी सब कुछ देख सकोगी। एक दिन अकस्मात उसके हाथ से दीपक नीचे टहलते हुए नाग बच्चों पर गिर गया। परिणाम स्वरूप उन सबकी थोड़ी पूंछ कट गई।
यह घटना घटित होते ही कुछ समय बाद वह ससुराल भेज दी गई। जब अगला सावन आया तो वह वधू दीवार पर नागदेवता को उरेहकर उनकी विधिवत पूजा तथा मंगल कामना करने लगी। इधर क्रोधित नाग बालक माताओं से अपनी पूंछ काटने का आदिकारण इस वधू को मानकर बदला लेने के लिए आये थे। लेकिन अपनी ही पूजा में श्रद्धा वनत उसे देखकर वे सब प्रसन्न हुए और उनका क्रोध समाप्त हो गया।
बहन स्वरूपा उस वधू के हाथ से प्रसाद के रूप में उन लोगों ने दूध तथा चावल भी खाया। नागों ने उसे सर्पकुल से निर्भय होने का वरदान दिया तथा उपहार में मड़ियों की माला दी।
उन्होंने यह भी बताया की श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को हमें भाई के रूप में जो भी पूजेगा हम उसकी रक्षा करते रहेंगे।
Nagpanchami Ka Mahatva-नाग पंचमी का महत्व
हिन्दू धर्म में नागों को विशेष स्थान प्राप्त है। इनका इतना अधिक महत्त्व है कि महादेव स्वयं वासुकि नामक नाग को अपने गले में धारण करते हैं तथा जगत के पालनहार भगवान विष्णु शेष शैय्या पर विराजमान रहते हैं। नाग शब्द संस्कृत और पालि का शब्द है जो भारतीय धर्मों में महान सर्प को दर्शाता है । नाग दिव्य या अर्ध-दिव्य देवता हैं।हिन्दू मान्यताओं में अष्टनागों का वर्णन मिलता है जिनका बहुत महत्व है।
Ashtnaag-अष्टनाग
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार अष्टनाग हैं – अनंत (शेष), 2. वासुकी, 3. तक्षक, 4. कर्कोटक, 5. पद्म, 6. महापद्म, 7. शंख और 8. कुलिक।
शेषनाग -कहा जाता है कि इनके के फन पर धरती टिकी हुई है यह पाताल लोक में ही रहते हैं। चित्रों में अक्सर हिंदू देवता भगवान विष्णु को शेषनाग पर लेटे हुए चित्रित किया गया है।मान्यता है कि शेषनाग के हजार मस्तक हैं। इनका कही अंत नहीं है इसीलिए इन्हें ‘अनंत’ भी कहा गया है।
वासुकि -शेषनाग के भाई वासुकि को भगवान शिव के सेवक थे। नागों के दूसरे राजा वासुकि का इलाका कैलाश पर्वत के आसपास का क्षेत्र था। पुराणों अनुसार वासुकि नाग अत्यंत ही विशाल और लंबे शरीर वाले माने जाते हैं। समुद्र मंथन के दौरान देव और दानवों ने मंदराचल पर्वत को मथनी तथा वासुकी को ही नेती (रस्सी) बनाया था। त्रिपुरदाह के समय वह शिव के धनुष की डोर बने थे।
तक्षक ने शमीक मुनि के शाप के आधार पर राजा परीक्षित को डंसा था। उसके बाद परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने नाग जाति का नाश करने के लिए नाग यज्ञ करवाया था। माना जाता है कि तक्षक का राज तक्षशिला में था।
कर्कोटक– कर्कोटक और ऐरावत नाग कुल का इलाका पंजाब की इरावती नदी के आसपास का माना जाता है। कर्कोटक शिव के एक गण और नागों के राजा थे। नारद ऋषि के शाप से वे एक अग्नि में पड़े थे, लेकिन नल ने उन्हें बचाया और कर्कोटक ने नल को डस लिया, जिससे राजा नल का रंग काला पड़ गया। लेकिन यह भी एक शाप के चलते ही हुआ तब राजा नल को कर्कोटक वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए। शिवजी की स्तुति के कारण कर्कोटक जनमेजय के नाग यज्ञ से बच निकले थे और उज्जैन में उन्होंने शिव की घोर तपस्या की थी। कर्कोटेश्वर का एक प्राचीन उपेक्षित मंदिर आज भी चौबीस खम्भा देवी के पास कोट मोहल्ले में है। वर्तमान में कर्कोटेश्वर मंदिर हरसिद्धि के प्रांगण में है।
पद्म – पद्म नागों का गोमती नदी के पास के नेमिश नामक क्षेत्र पर शासन था। बाद में ये मणिपुर में बस गए थे। असम के नागावंशी इन्हीं के वंश से है।
महापद्म– विष्णुपुराण में सर्प के विभिन्न कुलों में महापद्म का नाम भी आया है। पद्म और महापद्म नाग कुल में विशेष प्रीति थी।
शंख– नागों के 8 मुख्य कुलों में से एक है। शंख नागों पर धारियां होती हैं। यह जाति अन्य नाग जातियों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान मानी जाती थी।
कुलिक– कुलिक नाग जाति नागों में ब्राह्मण कुल की मानी जाती है जिसमें अनंत भी आते हैं। ये अन्य नागों की भांति कश्यप ऋषि के पुत्र थे लेकिन इनका संबंध सीधे ब्रह्माजी से भी माना जाता है।
नाग पंचमी के पावन पर्व पर वाराणसी (काशी) में नाग कुआँ मंदिर, नागचंद्रेश्वर मंदिर उज्जैन, नाग वासुकि मंदिर, तक्षेश्वर मंदिर आदि मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है और मेला लगता है। इनमें से कुछ मंदिरों में दर्शन मात्र से कालसर्प दोष की शांति हो जाती है।
नागचंद्रेश्वर मंदिर उज्जैन
आइए कुछ प्रमुख नाग मंदिरो के विषय में जानते हैं।भारत के प्रमुख नाग मंदिरो के विषय में जानने के लिए निम्न लेख पढ़ें।
सर्वे नागाः प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथ्वीतले. ये च हेलिमरीचिस्था येऽन्तरे दिवि संस्थिताः॥ ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिनः. ये च वापीतडगेषु तेषु सर्वेषु वै नमः॥
अर्थ – इस संसार में, आकाश, स्वर्ग, झीलें, कुएँ, तालाब तथा सूर्य-किरणों में निवास करने वाले सर्प, हमें आशीर्वाद दें तथा हम सभी आपको बारम्बार नमन करते हैं ।
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्. शङ्ख पालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा॥ एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्. सायङ्काले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः. तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्॥
अर्थ – नौ नाग देवताओं के नाम अनन्त, वासुकी, शेष, पद्मनाभ, कम्बल, शङ्खपाल, धृतराष्ट्र, तक्षक तथा कालिया हैं. यदि प्रतिदिन प्रातःकाल नियमित रूप से इनका जप किया जाता है, तो नाग देवता आपको समस्त पापों से सुरक्षित रखेंगे तथा आपको जीवन में विजयी बनायेंगे ।
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। गुरु पूर्णिमा भारतवर्ष की महान गुरु शिष्य परम्परा को समर्पित पर्व है। यह दिन गुरु और शिष्य दोनों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस दिन शिष्य अपने गुरु का पूजन और वंदन कर उनके द्वारा प्रदान किए ज्ञान के प्रति आभार प्रकट करते हैं।
गुरु पूर्णिमा 3 जुलाई 2023, सोमवार। पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ – 02 जुलाई 2023 को 08:21 पी एम पर। पूर्णिमा तिथि समाप्ति – 03 जुलाई 2023 को 05:08 पी एम पर।
Guru Purnima Ka Mahatva-गुरुपूर्णिमा का महत्व
यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है।
ऐसी मान्यता है कि गुरुपूर्णिमा के दिन ही भगवान शिव (प्रथम योगी), एक गुरु बने और योग-विज्ञान की तकनीक को पहेली बार सप्तऋषियों को प्रदान किया |
गुरु पूर्णिमा को बौद्धों द्वारा गौतम बुद्ध के सम्मान में भी मनाया जाता है। बौद्ध धर्म के अनुयायियों का मानना है कि गुरु पूर्णिमा के दिन ही गौतम बुद्ध ने उत्तर प्रदेश के सारनाथ नामक स्थान पर पांच भिक्षुओं कौण्डिण्य, वप्प, भद्दीय, अस्सजि और महानाम को अपना प्रथम उपदेश दिया था।
Guru Ka Arth-गुरु शब्द का अर्थ
गुरु शब्द गु + रु से मिलकर बना है। संस्कृत में गु का अर्थ होता है अंधकार तथा रु का अर्थ होता है वध करना, समाप्त करना। अतः गुरु का अर्थ हुआ – अंधकार को समाप्त करने वाला।
गुरु वह होता है जो हमारे मन में व्याप्त अज्ञान रूपी अंधकार को समाप्त कर देता है और हमें ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर अग्रसर करता है। यू तो व्यावहारिक रूप से हम शिक्षक को भी गुरु बोल देते हैं परन्तु वह सम्पूर्ण रूप से गुरु नहीं है।
वास्तविक गुरु तो वह है जो हमें इस संसार रूपी भव सागर से तारने वाला ज्ञान प्रदान करे। कबीर दास के अनुसार –
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट। अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।
गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा है, भीतर से हाथ का सहार देकर, बाहर से चोट मार – मारकर और गढ़ – गढ़ कर शिष्य की बुराई को निकलते हैं।
Guru Ka Mahatva-गुरु का महत्व
जिस किसी से भी हम ज्ञान प्राप्त करें वह हमारा गुरु ही होता है। देखा जाय तो जब कोई बच्चा जन्म लेता है तो सर्वप्रथम वह अपने माता-पिता, और घर के बड़े बुजुर्गों द्वारा ही सीखता है। कहा जा सकता है किसी बच्चे की प्रथम गुरु तो माता ही होती है। तत्पश्चात बच्चा विद्यालय जाकर ज्ञानार्जन करता है तथा अपने आस-पड़ोस के वातावरण से सीखता है। ।
परन्तु आत्मिक ज्ञान जिसके द्वारा व्यक्ति इस संसार रूपी भवसागर को पार कर जाता है उसके लिए गुरु का होना आवश्यक है।
संत कबीर दास के अनुसार
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
कबीर दास जी कहते हैं, कि यह जो शरीर है वह विष सामान बुराइयों (जहर) से भरा हुआ है और एक सच्चा गुरु, अमृत की खान अर्थात उन विष सामान बुराइयों का अंत करने वाला होता हैं।
गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष। गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मैटैं न दोष।।
कबीर दास जी कहते हैं – गुरु के बिना ज्ञान का मिलना असंभव है। जब तक कि गुरु कि कृपा नहीं प्राप्त होती तब तक मनुष्य अज्ञान रुपी अंधकार मे भटकता हुआ मायारूपी सांसारिक बन्धनो मे जकड़ा रहता है। मोक्ष रुपी मार्ग दिखलाने वाले गुरु हैं। गुरु के बिना सत्य एवम् असत्य का ज्ञान नहीं होता न ही व्यक्ति अपने दोषों को मिटा पाता है।
गुरु और शिक्षक में अंतर
आधुनिक काल में बच्चे स्कूल जाते हैं जहाँ उन्हें अध्यापकों के द्वारा भाषा,गणित विज्ञानादि विषयों का ज्ञान मिलता जिसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को जीवकोपार्जन हेतु उपयुक्त बनाना होता है। वहाँ पर शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बच्चे के अंदर विभिन्न कौशलों का विकास करना होता है जिनके द्वारा वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सके। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में स्वयं को जानना , अध्यात्म की शिक्षा आदि का आभाव ही दिखता है।
प्राचीनकाल में गुरुकुल होते थे जिनका उद्देश्य बच्चे को शिक्षित करने के साथ-साथ उनका आध्यात्मिक विकास करना भी होता था। अतः गुरुकुल व्यवस्था में गुरु को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।
अतः हम कह सकते हैं कि प्राचीनकाल में गुरु का स्थान था वह आज के शिक्षक से कहीं अधिक बृहत और उच्च था।
क्या गुरु का होना आवश्यक है
गुरु का होना आवश्यक अवश्य है परन्तु अनिवार्य नहीं। हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान दत्तात्रेय ने आत्मा को स्वयं का गुरु माना था। उन्होंने प्रकृति, वस्तुओं, जीव-जंतुओं और व्यक्तियों का अवलोकन करके आत्म-ज्ञान प्राप्त किया।
एक बार उनसे जंगल विहार करते समय यदु वंश के राजा से भेंट हुई। राजा ने उनसे उनकी प्रसन्नता का रहस्य और उनके गुरु का नाम पूछा। जब दत्तात्रेय जी ने बताया कि उनका गुरु स्वयं उनकी आत्मा है तथा उन्होंने 24 लोगों से ज्ञान लिया है जो उनके गुरु कहलाए।
दत्तात्रेय जी के 24 गुरु हैं: 1. पृथ्वी, 2. जल, 3. वायु, 4. अग्नि, 5. आकाश, 6. चंद्रमा, 7. सूर्य, 8. कबूतर, 9. अजगर, 10. महासागर, 11. पतंगा, 12 मधुमक्खी, 13. शहद इकट्ठा करने वाली, 14. हाथी, 15. हिरण, 16. मछली, 17. नर्तकी पिंगला, 18. कौआ, 19. बच्चा, 20. युवती, 21. नागिन, 22. एक तीर बनाने वाली , 23. मकड़ी और 24. भृंग।
परन्तु कुछ साधनाएं ऐसी अवश्य होती हैं जिनमें गुरु का होना अनिवार्य होता है। गुरु का होना साधक की आध्यात्मिक यात्रा को सहज और आसान बना देता है।
गुरु किसे बनाएं
यद्यपि हम सभी चाहते हैं कि हमें अच्छे गुरु की प्राप्ति हो परन्तु अच्छे गुरु की प्राप्ति ईश्वर की कृपा के बिना संभव नहीं है। हमें एक ऐसे व्यक्ति को अपना गुरु बनाना चाहिए जो हमारी समस्त शंकाओं का समाधान करने में समर्थ हो। कबीर दास के अनुसार –
जो गुरु ते भ्रम न मिटे, भ्रान्ति न जिसका जाय। सो गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय।
यदि कोई गुरु शिष्य की शंकाओं को ही दूर न कर सके, तो उस गुरु को त्यागने में ही भलाई है। यदि कोई गुरु भौतिक अथवा सांसारिक लाभ प्रदान करने का दावा करता है, तो समझ लीजिए उस गुरु में खोट है और वह त्याज्य है। चमत्कारिक शक्तियों का सार्वजनिक प्रदर्शन करने वाले व्यक्तियों से भी दूर ही रहना चाहिए।
तो फिर सद्गुरु की पहचान कैसे करें ?
सतगुरू की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार। लोचन अनंत उघाडिया, अनंत दिखावणहार।
ज्ञान के आलोक से संपन्न सद्गुरु की महिमा अनंत(जिसका वर्णन न किया जा सके) है। उन्होंने मुझपर जो उपकार किया है वह भी असीम है। उन्होंने मेरे अपार शक्ति संपन्न ज्ञान-चक्षु को खोल दिया जिससे मैं परम तत्व का साक्षात्कार कर सका। ईश्वरीय आलोक को दिखाने का श्रेय महान गुरु को ही है।
यदि आपको कोई योग्य गुरु न मिल रहा हो तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। आप अपने इष्ट जैसे-भगवान शिव, हनुमान जी को ही गुरु मानकर साधना के मार्ग पर अग्रसर रहें। जब ईश्वर की अनुकम्पा होगी तो आपको योग्य गुरु की प्राप्ति अवश्य होगी।
Guru Purnima Par Kya Karen-गुरु पूर्णिमा पर क्या करें
गुरु पूर्णिमा के दिन यदि आपके कोई गुरु हैं तो इस दिन उनके दर्शन अवश्य करें तथा उनका आशीर्वाद अवश्य लें। अपने गुरु को अपनी सामर्थ्यानुसार कोई भेंट अवश्य दें। भेंट में आप गुरु को श्वेत अथवा पीले वस्त्र, मिठाई, फल आदि दें सकते हैं। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है इस दिन गुरु द्वारा मिले ज्ञान के लिए आभार प्रकट करना। क्योंकि बिना गुरु की कृपा के मनुष्य के विकारों का नष्ट होना संभव नहीं है।कबीर दास जी कहते हैं –
बलिहारी गुर आपणैं, द्यौंहाडी कै बार। जिनि मानिष तैं देवता, करत न लागी बार।
गुरु की महिमा है की वह सामान्य जन को मनुष्य से देवता तुल्य बना देता है और ऐसा करने में उसे तनिक भी देर नहीं लगती है। ऐसे गुरु को मैं दिन में कितनी बार बलिहारी जाऊं/ नमन करूँ तात्पर्य है की ऐसे गुरु के चरणों में जितनी भी बार नमन करें कम ही होता है। यहाँ देवता तुल्य से आश्रय है कि गुरु मनुष्य के विकारों को नष्ट कर उसे देव तुल्य बना देता है।
आप गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने हेतु गुरु स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि गुरु न भी हो तो इस दिन अपने इष्ट के दर्शन करें और उनका पूजन करें।
त्रेतायुग जब विष्णु जी ने प्रभु श्रीराम के रूप में धरती पर जन्म लिया तब उनकी सहायता हेतु भगवान शिव के रुद्र अवतार के रूप में हनुमान जी में वानरराज केसरी और माता अंजना के यहाँ जन्म लिया। वे चिरंजीवी है मतलब त्रेता युग से अभी तक जीवित है। उन्हें माता सीता ने अजर अमर होने का आशीर्वाद दिया था।
हनुमान जी को कलयुग में सबसे प्रभावशाली देवताओं में से एक माना जाता है। कहा जाता है जहाँ कहीं भी राम कथा हो रही होती हैं वहाँ हनुमान जी किसी न किसी रूप में अवश्य उपस्थित रहते हैं। हनुमान जी का जन्मोत्सव उनके भक्तों के द्वारा बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर मंदिरों में अखंड रामायण, सुन्दरकाण्ड और हनुमान चालीसा का पाठ किया जाता है। भक्तों द्वारा भण्डारे का भी आयोजन किया जाता है।
Hanuman Jayanti Tithi-हनुमान जन्मोत्सव तिथि
हनुमान जयन्ती बृहस्पतिवार, 23 अप्रैल , 2024 को पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ – 23 अप्रैल , 2024 को 03:25 ए एम बजे पूर्णिमा तिथि समाप्त – 24 अप्रैल , 2024 को 5:18 ए एम बजे
Hanuman ji Kaun The-हनुमान जी कौन थे
हनुमान जी को भगवान शिव का रुद्रावतार माना जाता है। त्रेता युग में जब भगवान विष्णु ने रामअवतार लिया था तब उनकी सहायता हेतु भगवान शिव ने वानर जाति में अवतार लिया था। हनुमान जी को मारुतिनंदन, पवनपुत्र, केसरीनन्दन, महावीर, बजरंगबली आदि नाम से भी जाना जाता है। कहते हैं की प्रभु श्रीराम की कृपा पानी हो तो हनुमानजी की सेवा करनी चाहिए।
हनुमान जी को माता सीता ने अजर अमर होने का वरदान दिया था। इसलिए कहा जाता है कि हनुमान जी अभी भी धरती पर ही निवास करते हैं और अपने भक्तों की सहायता करते रहते हैं। हनुमान जी को कलयुग का देवता भी कहते हैं।
हनुमान जी बल,बुद्धि और चातुर्य का अतुलनीय सामंजस्य था। इसलिए हनुमान जी की पूजा करने से बल, बुद्धि और विद्या प्राप्त होते है। हनुमान जी को भक्तों में सबसे उच्च स्थान प्राप्त है क्योंकि उनका जो प्रभु श्री राम के प्रति समर्पण भाव था उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। अतः हम सभी को हनुमान जी के चरित का अनुसरण करना चाहिए। ऐसे करने पर हम सभी को प्रभु कृपा अवश्य प्राप्त होगी।
Hanuman Jayanti Pujan-हनुमान जन्मोत्सव पर हनुमान जी पूजन कैसे करें
सबसे पहले स्नान आदि से निवृत्त होने के पश्चात जिस स्थान पर हनुमान जी की पूजा करनी उसे साफ़ कर लें। वहां पर हनुमान जी का चित्र या मूर्ति रखें।
एक लोटे में स्वच्छ जल लें उसमें तुलसी पत्र डाल लें।
सबसे पहले हनुमान जी को पुष्प और अक्षत उनके चरणों पर अर्पित करें।
हनुमान जी के चरणों पर पीला सिंदूर अर्पित करें।
एक आटे का दीपक बना कर जलाएं। धूप जलाएं।
भोग के लिए गुड़ या गुड़ का बना हुई कोई मिठाई रखें।
सबसे पहले प्रभु श्रीराम का ध्यान करें फिर अपनी इच्छानुसार रामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड का पाठ करें। फिर हनुमान चालीसा का पाठ करने के पश्चात् हनुमान जी की आरती करें। राम जी स्तुति पढ़ें।
यदि आप किसी विशेष समस्या से ग्रसित हो तो आप हनुमान बाहुक या बजरंग बाण का पाठ भी कर सकते हैं।
कार्तिक पूर्णिमा(Kartik Purnima) को बहुत ही पवित्र माना जाता है। इसे देव दीपावली के नाम से भी जाना जाता है। इसी पवित्र दिन श्री गरूनानक देव का भी जन्म हुआ था। सिख लोग इस दिन को प्रकाशोत्सव के रूप में मनाते हैं।
इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं।इस दिन गंगा स्नान दीपदान अनुदान आदि का विशेष महत्व है। त्रिदेवों ने इसे महापुनीत पर्व कहा है। इस दिन कार्तिक के व्रत धारण करने वालों को ब्राह्मण पूजन हवन तथा दीपक जलाने का भी विधान है।
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ -26 नवम्बर , 2023 को 03:53 पी एम
पूर्णिमा तिथि समाप्त – 27 नवम्बर, 2023 को 02:45 पी एम
Kartik Purnima Ka Mahatva-कार्तिक पूर्णिमा का महत्व
काशी में इस अवसर पर दीपदान होता है। काशी इस अवसर पर स्वर्ग के समान प्रकार प्रतीत होती है।
यदि इस तिथि को कृतिका नक्षत्र पर चंद्र हो तथा विशाखा नक्षत्र सूर्य तब पद्मक योग होता है इसका बहुत महत्व है।पद्म पुराण के अनुसार पद्मक योग में किया गया कार्तिक स्नान जन्म जन्मांतर के पापों से मुक्ति दिलाता है।
इस दिन शिव जी की पूजा का विशेष महत्त्व है। पूर्व जन्म के प्रायश्चित के लिए भी शिव जी पूजा की जाती है। इस दिन रात्रि जागरण करके शिव जी की पूजा करनी चाहिए। इसी दिन शिवजी ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध किया था।
इस दिन 6 कृतिकाओं का पूजन करना चाहिए। चन्द्र दर्शन पर शिवा, प्रीति, सम्भूति, अनुसुइया, क्षमा ,संतति इन 6 कृतिकाओं का पूजन वंदन करने से संभूत फल मिलता है। संतान प्राप्ति, सम्पन्नता आदि की प्राप्ति हेतु कृत्तिकाओं का पूजन किया जाता है।
इस रात्रि में व्रत उपरांत बैल का दान देने से शिवलोक प्राप्त होता है।
कुछ लोग इस दिन भी तुलसी विवाह करते हैं।भगवान शालिग्राम रूप के साथ तुलसी विवाह करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। ऐसा भी कहा जाता है कि तुलसी विवाह कराने वाले व्यक्ति को कन्यादान के बराबर फल प्राप्त होता है।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार हुआ था।
इस दिन भीष्म पंचक की समाप्ति होती है।
इसी दिन में गुरु नानक जी का जन्म हुआ था गुरु नानक जयंती के रूप में मनाया जाता है
FAQ-प्रश्न्नोत्तर
भीष्म पंचक क्या होता है?
यह व्रत कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी से प्रारम्भ होकर कार्तिक पूर्णिमा को समाप्त होता है। इसे पञ्चभीका भी कहते हैं। कार्तिक स्नान करने वाले स्त्री पुरुष पांच दिन का निराहार व्रत रहते हैं। धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष की प्राप्ति हेतु यह व्रत किया जाता है।
कृत्तिकाएं कौन थी?
कृत्तिका सूर्य का नक्षत्र है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिव शक्ति के पुत्र कार्तिकेय का पालन पोषण छः कृत्तिकाओं ने किया जिसके फलस्वरूप उनसे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें 27 नक्षत्रों में स्थान दिया था।
त्रिपुरासुर कौन थे ?
त्रिपुरासुर ( त्रिपुर + असुर) अर्थात त्रिपुरों के असुर , तरकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली नामक तीन (असुर) भाई थे। वे तारकासुर के पुत्र थे। त्रिपुरासुरों ने घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से त्रि पुर बसाने का वरदान पाया था। उन्होंने सोने,चाँदी और लोहे के द्वारा तीन नगरों का निर्माण किया। यही नगर त्रिपुर कहलाये। जब तारकासुर के पुत्रों का अत्याचार अत्यधिक बढ़ गया तब भगवान शिव ने एक बाण द्वारा उनका वध किया। त्रिपुरासुर के वध के बाद से ही भगवान शिव को त्रिपुरारी कहा जाने लगा।
मत्स्य अवतार क्या है ?
मत्स्यावतार भगवान विष्णु का अवतार है जो उनके दस अवतारों में से प्रथम है। इस अवतार में भगवान विष्णु ने इस संसार को भयानक जल प्रलय से बचाया था। साथ ही उन्होंने हयग्रीव नामक दैत्य का भी वध किया था जिसने वेदों को चुराकर सागर की गहराई में छिपा दिया था।
गुरुनानक देव कौन थे ?
गुरु नानक सिखों के प्रथम (आदि )गुरु हैं। इनका जन्म कार्तिक पूर्णिमा के दिन (1539) में हुआ था। गरुनानक देव के प्रकट दिवस को गरूपर्व के रूप में मनाया जाता है।
कार्तिक शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को वैकुण्ठ चतुर्दशी(Vaikunth Chaturdashi) का व्रत किया जाता है। वैकुण्ठ चतुर्दशी के दिन हरि और हर अर्थात भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा की जाती है। जहाँ वैकुण्ठ चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु की निशीथ काल में पूजा करने का विधान है वहीं भगवान शिव की पूजा अरुणोदय के समय पर की जाती है। भक्त प्रातःकाल अरुणोदय के समय काशी में मणिकर्णिका घाट पर स्नान करते हैं। इस स्नान का बहुत अधिक महत्व है। इस पवित्र स्नान को मणिकर्णिका स्नान भी कहा जाता है।
इस दिन भगवान विष्णु को कमल के पुष्प अर्पित करके विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए।
वैकुण्ठ चतुर्दशी के पवित्र दिन के अवसर पर काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान विष्णु की विशेष पूजा होती है जो एक एक विख्यात शिव मंदिर और द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन काशी विश्वनाथ वैकुण्ठ के समान पवित्र हो जाता है। विष्णु जी और शिवजी की विधि विधान से पूजा होती है क्योंकि वह इस दिन एक दूसरे की पूजा करते हैं। सिर्फ वैकुण्ठ चतुर्दशी के अवसर पर ही भगवान शिव को तुलसी पत्र और भगवान विष्णु को बेलपत्र अर्पित किये जाते हैं।
चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ – 25 नवम्बर, 2023 को सायं 05:22
चतुर्दशी तिथि समाप्त – 26 नवम्बर, 2023 को सायं 03:53
वैकुण्ठ चतुर्दशी पर भगवान विष्णु और भगवान शिव का पूजन कैसे करें
इस दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव का पूजन किया जाता है। इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु को कमल के पुष्प अवश्य अर्पित करने चाहिए। भगवान को अक्षत पुष्प आदि चढ़ा कर भोग लगाएं।
यदि संभव हो तो विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और विष्णु जी द्वारा पठित भगवान शिव के शिव सहस्त्रनाम का पाठ करें।
वैकुण्ठ चतुर्दशी की कथा का श्रवण करें और आरती करें।
भगवान विष्णु का पूजन जहाँ निशीथ काल में किया जाता है वहीं भगवान शिव का पूजन अरुणोदय के समय होता है।
Vaikunth Chaturdashi Katha-वैकुण्ठ चतुर्दशी कथा
कथा 1
एक बार नारद जी मृत्यु लोक घूमकर बैकुंठ पहुंच। भगवान विष्णु ने प्रसन्नतापूर्वक बैठाते हुए आने का कारण पूछा ।
नारद जी ने कहा भगवान आपने अपना नाम तो कृपा निधान रख लिया है किंतु इससे तो केवल आपके प्रिय भक्त ही तर पाते हैं सामान्य नर नारी नहीं इसलिए आप कृपा करके ऐसा सुलभ मार्ग बताएं जिससे लोक के निम्न स्तरीय भक्त भी मुक्ति पा सके।
इस पर भगवान बोले हे नारद सुनो कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को जो नर नारी व्रत का पालन करते हुए श्रद्धा भक्ति से पूजा करेंगे उनके लिए साक्षात स्वर्ग की प्राप्ति होगी।
इसके बाद जय विजय को बुलाकर कार्तिक चतुर्दशी को स्वर्गद्वार खुला रखने का आदेश दिया भगवान ने यह भी बताया कि जो मनुष्य किंचित मात्र भी मेरा नाम लेकर पूजन करेगा उसे बैकुंठ धाम की प्राप्ति होगी।
कथा 2
शिव पुराण के अनुसार, एक बार, भगवान विष्णु ने अपना निवास वैकुंठ छोड़ कर शिव की पूजा करने काशी (वाराणसी) गए। उन्होंने एक हजार कमल के साथ शिव की पूजा करने का संकल्प लिया। शिव की स्तुति में भजन गाते हुए, विष्णु ने हजारवां कमल गायब पाया। विष्णु, जिनकी आँखों की तुलना अक्सर कमल से की जाती है, उनमें से एक को निकालकर शिव को अर्पित कर देते हैं। प्रसन्न शिव ने विष्णु की आंख को पुनः उन्हें दे देते हैं और उन्हें सुदर्शन चक्र, विष्णु के चक्र और पवित्र हथियार से सम्मानित किया।
Katha3–कथा 3
वाराणसी उत्सव से संबंधित वैकुंठ चतुर्दशी की कथा के अनुसार, धनेश्वर नाम का एक ब्राह्मण था , जिसने अपना जीवन कई पापों को करते हुए बिताया था, गोदावरी नदी के तट पर स्नान करने और अपने पापों को धोने के लिए गया था, जब वैकुंठ चतुर्दशी एक द्वारा मनाई जा रही थी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पवित्र नदी में मिट्टी के दीपक और बत्ती (बत्ती) चढ़ाते हैं।
भीड़ के बीच धनेश्वरकी मृत्यु हुई, तो उनकी आत्मा को मृत्यु के देवता यम ने दंड के लिए नरक में ले जाया गया। तब भगवान शिव ने हस्तक्षेप किया और यम को बताया कि वैकुंठ चतुर्दशी पर भक्तों के स्पर्श के कारण धनेश्वर के पाप साफ हो गए थे। तब धनेश्वर को नरक से मुक्त कर वैकुंठ में स्थान मिला
Vaikunth Chaturdashi Mela-वैकुण्ठ चतुर्दशी मेला, श्रीनगर
उत्तराखण्ड के गढ़वाल अंचल में श्रीनगर में बैकुंठ चतुर्दशी का मेला प्रतिवर्ष लगा करता है। श्रीनगर स्थित कमलेश्वर मन्दिर पौराणिक मन्दिरों में से है। इसकी अतिशय धार्मिक महत्ता है, किवदंती है कि यह स्थान देवताओं की नगरी भी रही है। इस शिवालय में भगवान विष्णु ने तपस्या कर सुदर्शन-चक्र प्राप्त किया तो श्री राम ने रावण वध के उपरान्त ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति हेतु कामना अर्पण कर शिव जी को प्रसन्न किया व पापमुक्त हुए।
उत्तराखण्ड के गढ़वाल अंचल में श्रीनगर में बैकुंठ चतुर्दशी का मेला प्रतिवर्ष लगा करता है।इस स्थान की प्राचीन महत्ता के कारण कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की चौदवीं तिथि को भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र प्राप्ति का पर्व माना गया है। इसे उपलब्धि का प्रतीक मानकर आज भी श्रृद्धालू पुत्र प्राप्ति की कामना से प्रतिवर्ष इस पर्व पर रात्रि में साधना करने हेतु मन्दिर में आते हैं। अनेक श्रृद्धालु दर्शन व मोक्ष के भाव से इस मन्दिर में आते हैं। जिससे उत्तराखण्ड के गढवाल क्षेत्र में यह मेला एक विशिष्ठ धार्मिक मेले का रूप ले चुका है।
श्रीनगर जो प्राचीन काल में श्री क्षेत्र कहलाता था। त्रेता युग में रावण वधकर रामचन्द्र जी द्वारा यहाँ पर 108 कमल प्रतिदिन एक माह तक भगवान शिव का अर्पण किया जाने का वर्णन मिलता है। प्रतिवर्ष कार्तिक मास की त्रिपुरोत्सव पूर्णमासी को जब विष्णु भगवान ने सहस कमल पुष्पों से अर्चनाकर शिव को प्रसन्न कर सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था, उस आधार पर वैकुण्ठ चतुर्दशी पर्व पर पुत्र प्राप्ति की कामना हेतु दम्पत्ति रात्रि को हाथ में दीपक धारण कर भगवान शंकर को मनोवांछित फल प्राप्ति हेतु प्रसन्न करते हैं।