देवउठान एकादशी के दिन श्री हरि के शालिग्राम रूप के साथ तुलसी विवाह संपन्न कराया जाता है। इस विवाह को पूरे विधि-विधान के साथ के साथ किया जाता है। जो भी इस दिन शालिग्राम के साथ तुलसी जी के साथ कराता है उसपर सदैव भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है।
इस दिन महिलाएं तुलसी जी को शृंगार का समान अर्पित करती हैं। तुलसी जी को भी दुल्हन की तरह सजाया जाता है। फिर उनका शालिग्राम के साथ विवाह सम्पन्न कराया जाता है। महिलाएं मंगल गीत गाती हैं।
महर्षि कश्यप की पत्नियों में एक का नाम दनु था। दनु के बहुत से महाबली पुत्र उत्पन्न हुए उनमें से एक का नाम विप्रचित्ति था जो महान बल पराक्रम से संपन्न था। उसका पुत्र दम्भ हुआ जो जितेंद्रिय धार्मिक तथा विष्णु भक्त था जब उसके कोई पुत्र नहीं हुआ तो उसको चिंता हुई उसने शुक्राचार्य को गुरु बना कर उनसे श्री कृष्ण मंत्र प्राप्त किया और पुष्कर में जाकर घोर तप करना आरंभ किया।
उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसको दर्शन दिया तब दंभ ने भगवान विष्णु से उनकी वंदना करके ऐसे वीर पुत्र का वरदान मांगा जो त्रिलोक को जीत ले परंतु देवता उसे पराजित ना कर सके।
कुछ समय पश्चात दंभ की पत्नी गर्भवती हुई और उसके गर्भ में श्री कृष्ण के पार्षदों में अग्रणी सुदामा नामक गोप प्रविष्ट हुआ। सुदामा को राधा जी ने क्रोधित होकर राक्षस कुल में जन्म लेने का श्राप दिया था।
कुछ समय पश्चात दंभ की पत्नी ने एक तेजस्वी बालक को जन्म दिया जिसका नाम शंखचूर्ण रखा गया शंखचूर्णअपने पिता के घर में शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की भांति बढ़ने लगा वह बहुत तेजस्वी था अतः उसने बचपन में ही सारी विद्या सीख ली शंखचूर्ण जब बड़ा हुआ तो पुष्कर में जाकर ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करने लगा उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे दर्शन दिया।शंखचूर्ण ने ब्रह्मा जी की वंदना की और और ब्रह्मा जी से वरदान मांगा कि वह देवताओं के लिए अजेय हो जाए तब ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर तथास्तु कहा।
ब्रह्मा जी ने शंखचूर्ण को दिव्य श्री कृष्ण कवच प्रदान किया ब्रह्मा जी ने शंखचूर्ण को आज्ञा दी कि वह बद्री वन को जाए जहां पर धर्म ध्वज की कन्या तुलसी सकाम भाव से तपस्या कर रही है ब्रह्मा जी ने शंखचूड़ को तुलसी से विवाह करने की आज्ञा दी।
वहीं तुलसी धर्मध्वज जो कि माता लक्ष्मी के परम भक्त थे की कन्या थी। तुलसी पूर्वजन्म में विराजा नाम की एक गोपिका थी जिसे राधा जी के श्राप के कारण पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा था। जन्म के बाद से ही तुलसी के मन में नारायण को प्राप्त करने की उत्कंठा थी।
(स्वर्ग के गोलोक में सुदामा और विराजा निवास करती थी। सुदामा विराजा से प्रेम करता था लेकिन विराजा श्री कृष्ण से प्रेम करती थी, एक बार जब विराजा और कृष्ण प्रेम में लीन थे, तो स्वयं राधा वहां प्रकट हो गईं। और राधा ने विराजा को श्रीकृष्ण के साथ देख कर विराजा को गोलोक से पृथ्वी पर निवास करने का श्राप दे दिया और किसी कारणवश राधा जी ने सुदामा को भी पृथ्वी पर निवास करने का श्राप दे दिया। जिससे उन्हे स्वर्ग से पृथ्वी पर आना पड़ा। मृत्यु के पश्चात सुदामा का जन्म राक्षस राजदम्ब के यहां शंखचूर्ण के रूप में हुआ और विराजा का जन्म धर्मध्वज के यहां तुलसी के रूप में हुआ।)
इसलिए नारायण की प्राप्ति हेतु उसने ब्रह्मा जी की तपस्या प्रारम्भ की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे दर्शन दिए और उसे आज्ञा दी कि वह दानव राज शंखचूर्ण से विवाह कर ले तब ही उसे नारायण की प्राप्ति हो सकती है।
इस प्रकार धर्मध्वज की कन्या तुलसी और दानव राज शंख चूर्ण का विवाह संपन्न हुआ विवाह के पश्चात शंख चूर्ण अपने घर लौट कर आया तो उसे दानवों का अधिपति बना दिया गया।
दानवों का अधिपति बनने के पश्चात राज्य विस्तार की कामना से शंखचूर्ण में देवताओं पर आक्रमण कर कर उनका संघार करना आरंभ कर दिया
उसने समस्त देवलोक पर अपना अधिकार प्राप्त कर लिया तब सारे देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हें सारी कथा सुनाई तब भगवान विष्णु हंसकर बोले शंख चूर्ण मेरा परम भक्त सुदामा गोप है जिसने राधा के श्राप वश दानव कुल में जन्म लिया है। भगवान शंकर द्वारा उसका वध पूर्व निर्धारित है तब सारे देवता मिलकर भगवान शिव के पास जाकर उनसे शंखचूड़ के वध की प्रार्थना करते हैं।
भगवान शिव शंखचूर्ण से युद्ध करते हैं परंतु जब तक शंखचूर्ण के पास ब्रह्मा जी द्वारा दिया हुआ दिव्य श्रीकृष्ण कवच था और जब तक उसकी पतिव्रता पत्नी तुलसी का सतीत्व अखंडित रहता तब तक वह शंखचूर्ण का वध नहीं कर सकते थे।
अतः भगवान विष्णु एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धरकर शंखचूर्ण के पास भिक्षा मांगने जाते हैं और शंख चूर्ण से वचन लेते हैं कि जब वह भिक्षा देने का वचन देगा तभी वह क्या भिक्षा चाहिए अन्यथा नहीं बताएगा। अतः शंखचूर्ण उसे वचन दे देता है।
वह वृद्ध ब्राह्मण भिक्षा में वह दिव्य कवच मांग लेता है जिसे शंखचूर्ण उसे दे देता है। इसके पश्चात भगवान विष्णु शंखचूर्ण का रूप धारण करके तुलसी के पास पहुंचे जहाँ पर तुलसी ने उन्हें अपना पति शंखचूर्ण समझकर उनका पूजन किया बातें की और रमण किया। तभी उनके रूप से तुलसी को यह एहसास हो गया कि यह उनका पति नहीं अपितु कोई और है।
उधर जैसे ही विष्णु जी तुलसी के सतीत्व को नष्ट करते है शिव जी अपने त्रिशूल द्वारा उसका वध कर देते हैं। वध के पश्चात् उसे श्राप से मुक्ति मिल जाती है और उसे पहले की भांति श्री कृष्ण के पार्षद रूप की प्राप्ति हो जाती है और उसके शरीर की राख से शंख जाति का प्रादुर्भाव हुआ जिस शंख का जल शंकर जी अतिरिक्त अन्य सभी देवताओं के लिए प्रशस्त माना जाता है।
तब तुलसी ने क्रोधित होकर पूछा कि तू कौन है जिसने मेरे सतीत्व को नष्ट कर दिया। तब भगवान विष्णु उसके समक्ष अपने असली रूप को प्रकट करते है। तब तुलसी क्रोधित होकर भगवान विष्णु को यह श्राप देती है कि जिस प्रकार से आपका ह्रदय पाषाण का हो गया है आप भी पाषाण में बदल जाएं।
तब भगवान शिव उसके समक्ष प्रकट होकर उसे समझाते है कि तुमने जिस मनोरथ को लेकर तप किया था वह भला अन्यथा कैसे जा सकता है। यह उसी तपस्या का फल है। अब तुम दिव्य देह धारण कर लक्ष्मी जी के समान वैकुण्ठ में विहार करती रहो।
तुम्हारा यह शरीर प्राण त्यागने के पश्चात् नदी के रूप में परिवर्तित हो जायेगा। वह नदी भारतवर्ष में पुण्यरूपा गंडकी के नाम से प्रसिद्ध होगी। कुछ काल के पश्चात् मेरे वर के प्रभाव से देव पूजन सामग्री में तुलसी का प्रधान स्थान हो जायेगा। तुम स्वर्गलोक में,मृत्युलोक में तथा पाताललोक में सदा ही श्री हरि के निकट निवास करोगी और पवित्र तुलसी का वृक्ष बन जाओगी।
उधर जो तुम्हारा नदी रूप होगा वह पुण्य प्रदान करने वाला होगा और वह श्री हरि के अंशभूत लवणसागर की पत्नी बनेगा। तथा श्रीहरि भी तुम्हारे श्रापवश पत्थर का रूप धारण कर भारत में गण्डकी नदी के जल में निवास करेंगे। वहाँ तीखी दाढ़ वाले कीड़े पत्थर को काटकर उसमें शंख की आकृति बनाएंगे। उसके भेद से वह अत्यंत पुण्य प्रदान करने वाली शालिग्राम शिला कहलाएगी।
उसे लक्ष्मीनारायण के नाम से भी जाना जायेगा। विष्णु जी की शालिग्राम शिला और वृक्षस्वरूपणी तुलसी का समागम सदा अनुकूल तथा बहुत प्रकार के पुण्यों की वृद्धि करने वाला होगा।
जो व्यक्ति शालिग्राम शिला के ऊपर से तुलसीपत्र को दूर करेगा उसे पत्नीवियोग सहना पड़ेगा और जो शंख को दूर करके तुलसी पत्र को हटायेगा उसे भी भार्याहीन होना पड़ेगा। जो लोग शालिग्राम शिला,तुलसी और शंख को एकत्रित करके उनकी रक्षा करते हैं वे सदैव ही श्री हरि को प्यारे होते हैं।
Tulsi Ka Mahatva
तुलसी के पौधे का ज्योतिषीय महत्व
तुलसी के पौधे का सनातन धर्म में विशेष महत्व है। जहाँ कहीं भी तुलसी का पौधा लगा होता है वहाँ पर सकारात्मक ऊर्जा होती है तथा तुलसी के पौधे लगाने से बहुत बड़े-बड़े वास्तु सम्बन्धी दोष नष्ट हो जाते है। ज्योतिष शास्त्र में तुलसी के पौधे को बुध ग्रह से जोड़कर देखा जाता है। अतः यदि कुंडली में बुध कमजोर हो तो तुलसी और भगवान श्री कृष्ण की पूजा करें और भगवान श्री कृष्ण को तुलसी पत्र अर्पित करें। यदि किसी बच्चे में कंसंट्रेशन की कमी हो तो उसे सफ़ेद या लाल धागे में तुलसी की जड़ रविवार के दिन पहनाएं।
Tulsi Ji Ki Aarti-तुलसी जी की आरती
वैसे तो सम्पूर्ण कार्तिक मास में तुलसी जी की आरती करनी चाहिए। परन्तु Tulsi Vivah के पश्चात तुलसी जी की आरती अवश्य करें।
जय जय तुलसी माता,मैया जय तुलसी माता । सब जग की सुख दाता,सबकी वर माता ॥ जय जय तुलसी माता……..
सब योगों से ऊपर,सब रोगों से ऊपर । रज से रक्षा करके,सबकी भव त्राता ॥ जय जय तुलसी माता……..
बटु पुत्री है श्यामा,सुर बल्ली हे ग्राम्या । विष्णुप्रिये जो तुमको सेवे,सो नर तर जाता जय जय तुलसी माता……..
हरि के शीश विराजत,त्रिभुवन से हो वन्दित। पतित जनों की तारिणी,तुम हो विख्याता। जय जय तुलसी माता……..
लेकर जन्म विजन में,आई दिव्य भवन में । मानव लोक तुम्हीं से,सुख-संपति पाता ॥ जय जय तुलसी माता……..
हरि को तुम अति प्यारी,श्याम वर्ण सुकुमारी । प्रेम अजब है उनका,तुमसे कैसा नाता ॥ हमारी विपद हरो तुम,कृपा करो माता ॥ जय जय तुलसी माता……..
जय जय तुलसी माता,मैया जय तुलसी माता । सब जग की सुख दाता,सबकी वर माता ॥ जय जय तुलसी माता……..
पितृ दोष(Pitra Dosh) ज्योतिष शास्त्र के चर्चित बुरे योगों में से एक है हो यदि कुंडली में उपस्थित हो तो जीवन को अत्यंत कठिन बना देता है क्योंकि यदि किसी जातक की जन्म पत्रिका में यह दोष उपस्थित हो तो जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा कुछ भी आसानी से नहीं प्राप्त होता है।
Pitra Dosh Kya Hota Hai–पितृ दोष क्या होता है
शास्त्रों के अनुसार हम सभी जब इस भूलोक में जन्म लेते हैं तो हमारे ऊपर तीन ऋण होते हैं –देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण।
1) देव ऋण – देवताओं का ऋण, जो हमें वर्षा और भोजन प्रदान करते हैं। धार्मिक कार्य जैसे पूजा ,दान पुण्य , यज्ञ आदि करने से ये ऋण दूर होते है।
2) ऋषि ऋण – ऋषियों का ऋण, जो हमें ज्ञान देते हैं। जो ज्ञान हमने प्राप्त किया है उसे दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित करना होता है।
3) पितृ ऋण – हमें जन्म देने वाले पूर्वजों का ऋण। जब हम पाणिग्रहण संस्कार द्वारा सन्तानोपत्ति करते हैं तो हम पितृ ऋण से मुक्त होते हैं।
जिन्हें हमें अपने कर्मों द्वारा वापस करना होता है। यदि हम ऐसा करने में असमर्थ रहते हैं तो यह ऋण हमारी जन्म कुंडली में दोष के रूप में परिलक्षित होते हैं। ये ऋण जन्म जन्मांतर तक चलते हैं। पितृ दोष हमारे पूर्व जन्म में अपने कर्तव्यों की पूर्ति न कर पाने के कारण उत्पन्न होता है या हमारे पूर्वजों द्वारा कोई अपराध हुआ होता है जिसका परिणाम आगे आने वाली पीढ़ियों को पितृ दोष(pitra dosh) के रूप में झेलना पड़ता है।।
Janam Kundali Me Pitra Dosh
यदि हमारे पूर्वजों द्वारा कुछ गलत कर्मों के कारण परिवार को श्राप लगा होता है या हमारे पितृ तृप्त नहीं होते हैं तो पितृ दोष उत्पन्न होता है। कुंडली में सूर्य पर यदि राहु, केतु या शनि का प्रभाव हो तो पितृ दोष का निर्माण होता है। कुछ विद्वान् नवम भाव के अत्यधिक पीड़ित होने पर पितृ दोष मानते हैं। पितृ दोष जीवन में किसी भी कार्य में अत्यधिक विलम्ब करता है या बहुत गंभीर स्थिति में कभी-कभी विवाह या संतान नहीं होने देता है।
Pitra Dosh Lakshan-लक्षण द्वारा जाने कुंडली में पितृ दोष है या नहीं
यदि कुंडली में पितृ दोष हो तो कोई मंगल कार्य जैसे विवाह नहीं होता या बहुत कठिनाई से होता है।
पितृ दोष वाले घर में लड़ाई झड़गे होते रहते हैं। परिवार के सदस्यों की आपस में नहीं बनती है।
घर के बुजुर्ग बीमारी से पीड़ित रहते हैं।
लोगों की नौकरी नहीं लग पाती है या लग कर छूट जाती है।
प्रतिष्ठा या तो प्राप्त नहीं होती या प्राप्त होकर चली जाती है।
परिवार छोटा होता चला जाता है।
धन या तो आएगा नहीं अगर आएगा रुकेगा नहीं रोग में जायेगा।
संतान होने में दिक्कत रहती है और संतान होती भी है तो उससे सुख नहीं मिल पाता।
कठिन परिश्रम के बावजूत अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता है।
परिवार में असमय मृत्यु होने पर भी पितृ दोष उत्पन्न होता है।
Pitra Dosh Ke Upay–पितृ दोष के उपाय
पितृ दोष कभी ख़तम न होने वाला दोष है। इसके उपाय जीवन पर्यन्त करने पड़ते हैं। परन्तु निरंतर उपाय करते रहने पर परिस्थितियां बेहतर होती हैं। निम्न उपाय को करके पितृ दोष के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
पितृ दोष के उपाय के पितृ पक्ष सबसे अच्छा समय होता है। इस समय में पितरों के निमित्त दान-पुण्य, यज्ञ आदि करने से पितृ दोष का प्रभाव क्षीण होता है। पितृ पक्ष में क्या उपाय करें ये जांनने के लिए हमारा निम्न लेख पढ़ें।जाने क्या है पितृ पक्ष, क्या करें
पितृ पक्ष के अलावा पितृ दोष के उपाय प्रत्येक अमावस्या को किए जाते हैं। अमावस्या को अपनी सामर्थ्य के अनुसार अनाज का दान किसी जरूरतमंद को दें।
अमावस्या को सूर्यास्त के बाद शिवलिंग के पास आटे का बना देशी घी का दीपक जलाएं तथा अपने और अपने पूर्वजों द्वारा किए हुए अपराध की क्षमा मांगें।
रोजाना पक्षियों के लिए दाना और पानी रखें।
विष्णु जी या उनके किसी स्वरुप के मंत्र को श्रद्धापूर्वक नित्य पाठ करें। यदि कुछ भी सम्भव न हो तो केवल यही उपाय कर लें। परिस्थियां जरूर सामान्य होंगी बस आपको स्वयं पर और ईश्वर पर विश्वाश रखना है और अपना आचरण अच्छा रखना है।
आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या पंद्रह दिन पितृपक्ष(Pitru Paksha) के नाम से विख्यात है। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों (पूर्वजों) को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं। माता- पिता, दादा-दादी आदि पारिवारिक मनुष्यों की मृत्यु के पश्चात् उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं।
कहीं-कहीं पर पितृ पक्ष को कनागत के नाम से भी जाना जाता है जो कन्यार्कगत का अपभ्रंश है। कन्यार्कगत जिसका अर्थ है सूर्य का कन्या राशि में होना। पितृ पक्ष में सूर्य कन्या राशि में होते हैं। इस समय में पितृ लोक भूलोक के सबसे करीब होता है।
Shraadh Kya Hota Hai-श्राद्ध क्या होता है
श्रद्धया इदं श्राद्धम् (जो श्र्द्धा से किया जाय, वह श्राद्ध है।) तात्पर्य है पित्तरों के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाए वह श्राद्ध है।अतः पितरों के निमित्त जो भी हम करते हैं उसमें हमारी भावना अत्यंत महत्वपूर्ण है। पितृ पक्ष(Pitru Paksha) में तीन पीढ़ी तक पिता पक्ष और माता पक्ष को जल दिया जाता है।
पार्वण श्राद्ध
यमस्मृति, गरुड़ पुराण और भविष्य पुराण में 12 प्रकार के श्राद्धों का वर्णन है । ये हैं नित्यश्राद्ध , नैमित्तिक , काम्य श्राद्ध , नान्दीमुख , पार्वण , सपिंडी , गोष्ठी श्राद्ध , शुद्धार्थ , करमांग , दैविक , यात्यार्थ और पुष्ट्पर्य श्राद्ध। इन सभी श्राद्धों का महत्व और इन्हें करने का समय अलग है। अश्विन कृष्ण पक्ष में होने वाले श्राद्धों को महालय पार्वण श्राद्ध कहा जाता है ।
Pitru Kaun Hote Hai–पितृ कौन होते हैं
परिवार के वे सदस्य जिनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितृ कहते हैं। जब तक किसी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उसका जन्म नहीं होता वह सूक्ष्म लोक में रहते है। वो पितृ सूक्ष्म लोक से हमे आशीर्वाद देते हैं। पितृ पक्ष में पितृ धरती पर आते हैं और अपने परिजनों को आशीर्वाद देते हैं।
पितृ पक्ष में पितृों को याद किया जाता हैऔर उनकी याद में दान पुण्य किया जाता है। पितृ पक्ष में पितरों के निमित तर्पण करते है यह तर्पण या तो घर के बड़े पुत्र या छोटे पुत्र द्वारा किया जाए तो अच्छा होता है। यदि पुत्र न हो तो यह अधिकार पुत्री के पुत्र को भी प्राप्त होता है। यदि घर में पुरुष सदस्य न हो तो पुत्रियां भी पितरों के निमित्त तर्पण कर सकते हैं।
अग्नि पुराणके अनुसार पितरों के तीन स्वरुप होते हैं। पिता वसु स्वरूप होते हैं, दादा रूद्र स्वरूप तथा परदादा आदित्य स्वरूप होते हैं। जिस भी पितृ को जल दे रहे हो उनका ध्यान करके उनको जल प्रदान करें तथा ये भावना करें कि वो तृप्त हों।
पितृ पक्ष में पितरों के निमित्त तर्पण करें। जल देते समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करके दोपहर के समय मिट्टी या तांबे के पात्र में काला तिल, जौ, अक्षत, हलकी सुगंध वाले श्वेत पुष्प दाल कर तर्पण करें। कुशा के सहारे पितरों को जल प्रदान करें।
पितृदोष के निवारण के लिए गुप्त दान करें। यदि संभव हो सके तो रोजाना पितरों के नाम से जरुरतमंदो को अन्न का दान दें।
रोजाना गाय, कुत्ते, कौए का ग्रास निकालें। प्रथम ग्रास कौवे का होता है क्योंकि ये मान्यता है कौए के रूप में पितृ भोजन को ग्रहण करने आते हैं।
गाय के लिए चारे की व्यवस्था कराएं यदि न संभव हो तो गुड़ रोटी आदि खिलाएं।
यदि कुंडली में पितृ दोष का निर्माण हो रहा हो तो रोजाना पितरों के लिए शिव मंदिर शिवलिंग के पास में देशी घी का आंटे का दीपक जलाएं। शिव जी से पितरों की शांति की कामना करें तथा अपने द्वारा हुए अपराध की भी क्षमा मांगें।
नित्य श्रीमद्भागवत गीता का पाठ करें।
रोजाना एक जल से भरे पात्र में सरसों के तेल का दीपक रखकर दक्षिण के ओर मुख करके जलाएं जिसे घर के मुख्य द्वार पर रखें।
पितृ पक्ष के दौरान सात्विक भोजन ग्रहण करें। प्याज लहसुन का प्रयोग न करें।
श्राद में उपरांत ब्राह्मणों और जरुरतमंदो को भोजन कराएं तथा उन्हें अपनी सामर्थ्य के अनुसार वस्त्रादि का दान दें। कर्ज लेकर श्राद न करें। पितरों के प्रति हमारी भावना महत्वपूर्ण है।
यदि कुंडली में पितृ दोष है तो पितृ विसर्जनी अमावस्या को यज्ञ करें। यज्ञ के पश्चात नारियल, हल्दी की गांठ रूपये का दान करें। इस यज्ञ में परिवार के सभी सदस्यों को सम्मिलित होना चाहिए।
पितृ विसर्जनी अमावस्या के दिन गौ, कुत्ते और कौए का भोजन निकलने के पश्चात ब्राह्मण को भोजन कराएं भोजन में पूरी और खीर अवश्य रखें। उसके उपरांत पितरों को धन्यवाद और क्षमा मांगने के पश्चात उन्हें अपने लोक को विदा करें तथा उनसे परिवार पर कृपा बनाएं रखने की प्रार्थना करें।
Shraad Ki Mahatvapurn Din–श्राद्ध की महत्वपूर्ण तारीखें
पंचमी श्राद्ध- जिन पितरो की मृत्यु पंचमी तिथि को हुई हो या अविवाहित स्थिति में हुई है तो उनके लिए पंचमी तिथि का श्राद्ध किया जाता है।
नवमी श्राद्ध – नवमी तिथि को मातृनवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस तिथि पर श्राद्ध करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।
चतुर्दशी श्राद्ध- इस तिथि उन परिजनों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो
सर्वपितृ अमावस्या- जिन लोगों के मृत्यु के दिन की सही-सही जानकारी न हो, उनका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है।
कौए को पितरों का वाहक रूप माना जाता है। मान्यता है कि श्राद्ध ग्रहण करने के लिए हमारे पितर के लिए वाहक बन कौए नियत समय पर घर पर आते हैं। अगर उन्हें श्राद्ध नहीं मिलता है तो वह रूष्ट हो जाते हैं और श्राप देकर चले जाते हैं इसलिए श्राद्ध का प्रथम अंश कौओं के लिए निकाला जाता है।
सपने छवियों, विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं का एक क्रम है जो हमारे मन के सोते वक्त बनाता है। यह प्रक्रिया मन में अनैच्छिक रूप से होती है। मनुष्य प्रति रात लगभग दो घंटे स्वप्न देखने में व्यतीत करता है, और प्रत्येक स्वप्न लगभग 5 से 20 मिनट तक रहता है।सपने(Sapno Ka Arth) मनोरंजनक, मजेदार, रोमांटिक, चिंताजनक और कभी-कभी अद्भुत हो सकते हैं।
जब भी हम कोई ख़ास स्वप्न देखते हैं तो हमारे मन में यह विचार उत्पन्न होते हैं कि ये स्वप्न(sapno ka arth) क्यों आया। सपनों का हमारे स्वास्थ्य से सीधा संबंध होता है। दिन भर में किये गए क्रिया कलाप भी हमारे सपनों को प्रभावित करते हैं। इस लेख के माध्यम से हम विभिन्न सपनों का अर्थ (sapno ka arth)जानने का प्रयास करेंगे।
Vibhinn Sapno Ka Arth-सपनों का अर्थ
आंधी तूफान या वायु /आकाश का स्वप्न यह दर्शाता है की शरीर की वायु कुपित है। सपने खुद को किसी आंधी या तूफान में फंसा हुआ देखें, हवा में झूलती हुई चीजें देखें तो यह शरीर की वात बिगड़ी होने की निशानी है। पानी झरना या नदी या जल सम्बंधित स्वप्न दिखे तो कफ तत्व गड़बड़ हो सकता है।आग, ज्वालामुखी या सूर्य का सपना देखना इस बात का द्योतक है कि आपका पित्त बिगड़ा हुआ है
सपने में अपने आपको ऊंचाई से गिरता देखना दुर्भाग्य की निशानी है। धन का नुकसान या मानहानि हो सकती है। ऊपर से गिरना कफ नाड़ी के कुपित होने का भी संकेत है। अतः कफ सम्बन्धी रोगों के प्रति सतर्क रहें।
यदि सपने हम किसी रोते हुए व्यक्ति को चुप करा रहें हो तो यह अच्छा संकेत होता है। इसका अर्थ के निकट भविष्य में हमें उन्नति या कोई पुरस्कार मिलने वाला है।
स्वयं को मरा हुआ देखना अच्छी निशानी है। यह जीवन में परिवर्तन को दर्शाता है। यदि यह सपना कई बार आये तो आपको अध्यात्म से जुड़ने की जरुरत है।
सपने में लाल रंग दिखाई देना बहुत शुभ नहीं माना जाता है। यदि आपको किसी भी रूप में सपने में लाल रंग बार-बार दिखाई दे तो अपने इष्ट की आराधना करें या महमृत्युञ्जय मन्त्र का जप करें। यह दुर्घटना का सूचक होता है।
यदि किसी पुरुष को सपने में बार-बार कोई स्त्री दिखाई दे तो यह ख़राब स्वास्थ्य और मानहानि का सूचक होता है। यदि पुरुष सपने में किसी स्त्री के साथ कहीं जाए तो यह मन की कमजोरी का संकेत होता है। ऐसा व्यक्ति अकेलेपन का शिकार होता है।
यदि किसी स्त्री को पुरुष का स्वप्न बार-बार आए तो यह थकान और दुःखी होने का संकेत है। यह सेहत की खराबी की निशानी है।
यदि हमें ऊपर से गिरने का स्वपन आए जैसे -छत से या पहाड़ से गिंरना। तो यह दुर्भाग्य का सूचक है। यह धन हानि का भी संकेत देता है। अपने इष्ट का ध्यान करें। ऊपर से गिरना कफ प्रकृति का सूचक होता है।
यदि स्वप्न में बार-बार स्वयं बीमार देखें तो रक्त सम्बन्धी बीमारी हो सकती है। तुलसी का प्रयोग शुरू करें।
सपने में यदि ऐसा लगे कि कोई गला दबा रहा है तो आपको सांस सम्बन्धी समस्या हो सकती है।
सपने में अपनी हत्या देखना मोटापा सम्बंधित बीमारी, व्यापार में घाटा, प्रतिष्ठा में कमी का संकेत है। ऐसे में इष्ट की उपासना प्रारम्भ करें।
यदि सपने में अपनी मृत्यु देखें तो इष्ट की उपासना करें। साथ यदि जन्मकुंडली में राहु के बुरे प्रभाव दृष्टिगत हो रहे हों तो सूर्य पूजा करें, सूर्य को अर्घ्य दें, कागजों का ध्यान रखें और दस्तखत ध्यान से करें।
सपने में मृत व्यक्तियों का दिखना अच्छा संकेत है। यह किसी अनिष्ट से बचने का संकेत है। यह घर में किसी के स्वास्थ्य या अन्य परेशानियों के प्रति आगाह करता है।
सपने में शव को देखना अच्छा संकेत नहीं है। इसका अर्थ है की आपकी मेहनत बेकार हो सकती है। यदि ऐसा स्वप्न आए तो अपनी कुंडली के भाग्य के स्वामी के उपाय करें।
सपने में बार-बार बच्चा देखना शुभ संकेत है। यह परिवार में वृद्धि का संकेत है। यदि किसी महिला को सपने में बच्चा दिखे तो परिवार में नया सदस्य आने का संकेत है।
सपने में इष्ट को देखना तो जन्म सफल होगा। यह बहुत अच्छा संकेत है।
सपने में गुरु को देखना बहुत शुभ होता है।
यदि सपने में शिक्षक डांटें तो यह सफलता की निशानी है।
सपने में पूजा पाठ करना, या होते हुए देखना बहुत शुभ होता है। समस्याओं का अंत होने वाला है।
गणेश जी को भगवान गणेश, गणपति, विनायक या विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता हैं। उन्हें हिन्दू धर्म के महत्वपूर्ण देवता (Ganesh Ji Ke 8 Avatar) के रूप में पूजा जाता है। गणेश जी को भक्ति, विद्या और समृद्धि के देवता के रूप में पूजे जाता है। उन्हें “विघ्नहर्ता” अर्थात विघ्नों को हरने वाला कहते है, जो किसी भी काम या क्रिया में आने वाली कठिनाइयों और विघ्नों को दूर करने में मदद करते हैं। गणेश जी को सबसे पहले “विघ्नहर्ता” के रूप में पूजने की परंपरा है, ताकि उनकी कृपा से सभी विघ्नों से मुक्ति मिले।
भगवान गणेश के अनेक अवतार हुए हैं पर उसमें से आठ अवतार (Ganesh Ji Ke 8 Avatar) प्रमुख हैं – वक्रतुण्ड, एकदन्त, महोदर, गजानन, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज और धूम्रवर्ण। गणेश पुराण में भी सूतजी ने शौनक जी को गणेश जी 8 अवतारों का वर्णन किया है जो की निम्न हैं ।
हे शौनक ! भगवान गणेश का वक्रतुंड अवतार देह ब्रह्म का धारक है। उनके द्वारा मत्सरासुर का संहार हुआ था। वे भगवान सिंह पर आरूढ़ होने वाले कहे गए हैं।
Ganesh Ji Ke 8 Avatar
Ekdant-एकदन्त
एकदन्तावतारो वै देहिनां ब्रह्मधारकः।
मदासुरस्य हन्ता स आखुवाहनगः स्मृतः।।
एकदन्त संज्ञक अवतार देही ब्रह्म को धारण करने वाला और मदासुर का संहारक है। हे शौनक उनका वाहन मूषक कहा जाता है।
Mahodar-महोदर
महोदर इति ख्यातो ज्ञान ब्रह्म प्रकाशकः।
मोहासुरस्य शत्रुवै आखुवाहनगः स्मृतः।।
हे शौनक महोदर नाम से विख्यात गणेश जी का अवतार ज्ञान ब्रह्म का प्रकाश करने वाला है। उन मूषक वाहन को मोहासुर का वध करने वाला कहा जाता है।
Gajanan-गजानन
गजाननः स विज्ञेयः सांख्येभ्यः सिद्धिदायकः।
लोभासुरप्रहर्ता वै आखुगश्च प्रकीर्तितः।।
हे शौनक गणेश जी का जो अवतार गजानन नाम से जाना जाता है वह सांख्य योगियों के लिए सिद्धि देने वाला है। क्योंकि वह सांख्य ब्रह्म का धारक है। उस अवतार में उन्होंने लोभासुर का विशेष रूप से संहार किया। उस अवतार को भी विद्वान् लोग मूषक वाहन कहते हैं।
Lambodar-लम्बोदर
लम्बोदरावतारो वै क्रोधासुरनिवर्हणः।
शक्तिब्रह्माखुगः सत् तत् धारक उच्चयते।।
हे शौनक लम्बोदर नामक अवतार में गणेश जी ने क्रोधासुर का संहार किया है। यह अवतार ब्रह्म की सत्य स्वरूपा शक्ति का धारक कहा गया है। इसमें भी उनका वाहन मूषक रहा।
Vikat-विकट
विकटो नाम विख्यातः कामासुरविदारकः।
मयूरवाहनाश्चायं सौरब्रह्मधरः स्मृतः।।
हे शौनक गणेश जी के विकट अवतार द्वारा कामासुर का संहार हुआ। ये प्रभु सौरब्रह्म को धारण करने वाले मयूरवाहन कहे जाते हैं।
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Vighnaraj-विघ्नराज
विघ्नराजावतारश्च शेषवाहन उच्यते।
ममतासुरहन्ता स विष्णुब्रह्मेति वाचकः।।
हे शौनक भगवान गणपति का जो विघ्नराज नामक अवतार है वह शेषवाहन कहा जाता है। वह ममतासुर का संहारक और विष्णु-ब्रह्मा का वाचक है।
Ganesh Ji Ke 8 Avatar Vighnraj
Dhumravarn-धूम्रवर्ण
धूम्रवर्णावताराश्चाभिमानासुरनाशकः।
आखुवाहनश्चासौ शिवात्मा तु स उच्यते।।
हे शौनक गणेश जी का धूम्रवर्ण नामक जो अवतार हुआ उसके द्वारा अभिमान नामक असुर का नाश हुआ था। वे प्रभु शिव ब्रह्म स्वरूप एवं मूषक वाहन कहे जाते हैं।
Ganesh Ji Stuti Mantra
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटी समप्रभा। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येशु सर्वदा॥
घुमावदार सूंड वाले, विशाल शरीर काय, करोड़ सूर्य के समान महान आभा है । हमेशा मेरे सारे कार्य हमेशा बिना विघ्न के संपन्न हो, हे देव ऐसी कृपा करें।
हे हाथी के मुख वाले, भूत गणों के द्वारा सेवा किए जाने वाले, आप कपिथा (कैथा) जाम्बु /जामुन को चाव से ग्रहण करने वाले हैं। उमा अर्थात पार्वती जी के पुत्र ,आप समस्त दुखो को समाप्त करते हैं। मैं विघ्न को दूर करने वाले श्री गणेश जी के चरण कमल को नमन करता हूँ।
“भवसागर तारण कारण हे।”(Bhav Sagar Taran Karan He Lyrics) गुरु को समर्पित वंदना है। इस लेख के माध्यम से हम इस कर्णप्रिय गुरु वंदना के बोल और उसका अर्थ आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहे हैं।
महिमा तव गोचर शुद्ध मने ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥७॥
जय सद्गुरु ईश्वर प्रापक हे ।भवरोग विकार विनाशक हे ॥
मन जेन रहे तव श्रीचरणे ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥८॥
Bhav Sagar Taran Karan He Lyrics
Bhav Sagar Taran Karan He Lyrics With Meaning
भवसागर तारण कारण हे ।रविनन्दन बन्धन खण्डन हे ॥ शरणागत किंकर भीत मने ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥१॥
जो इस संसार रूपी भवसागर से तारने के कारण हैं, जो बंधन को खंडित(तोड़ने) करने वाले हे रवि पुत्र , इस संसार से भयभीत आपकी शरण में आया हूँ, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
हृदिकन्दर तामस भास्कर हे ।तुमि विष्णु प्रजापति शंकर हे ॥ परब्रह्म परात्पर वेद भणे ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥२॥
हे हृदय रूपी गुहा के अंधकार को दूर करने वाले भास्कर, तुमही विष्णु, प्रजापति(ब्रह्मा) और शिव हो, वेद तुम्हे ही परम ब्रह्म बताते हैं, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
मनवारण शासन अंकुश हे ।नरत्राण तरे हरि चाक्षुष हे ॥ गुणगान परायण देवगणे ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥३॥
हे भटकते हुए मन पर अंकुश, जो लोगों की रक्षा करने वाले साक्षात हरि का स्वरूप हैं, जिसका देवता भी गुणगान करते हैं, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
कुलकुण्डलिनी घुम भंजक हे ।हृदिग्रन्थि विदारण कारक हे ॥ मम मानस चंचल रात्रदिने ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥४॥
हे जो सोई हुई कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करने वाले हैं, हे हृदय की गांठों को खोलने वाले, मेरा मन दिन-रात चंचल है, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
रिपुसूदन मंगलनायक हे ।सुखशान्ति वराभय दायक हे । त्रयताप हरे तव नाम गुणेगुरुदेव दया करो दीनजने ॥५॥
जो शत्रुओं का नाश करने वाले और मंगल करने वाले है, जो सुख, शांति, वर और अभय प्रदान करते हैं, आपके नाम के प्रभाव से तीनों ताप आध्यात्मिक, अधिदैविक, अधिभौतिक ताप का नाश होता है, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
अभिमान प्रभाव विमर्दक हे ।गतिहीन जने तुमि रक्षक हे ॥ चित शंकित वंचित भक्तिधने ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥६॥
जो हमारे अंदर के अभिमान का विमर्दन(नष्ट) करने वाले, गतिहीन जनों को अपनी शरण में लेने वाले, मेरा मन हमेशा इस बात से भयभीत रहता है कि मैं आपकी भक्ति से वंचित न हो जाऊं, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
तव नाम सदा शुभसाधक हे ।पतिताधम मानव पावक हे ॥ महिमा तव गोचर शुद्ध मने ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥७॥
आपका नाम सदैव शुभता को बढ़ाने वाला है, आप पापी जनों को पवित्र करते हैं, आपकी महिमा मन को पवित्र करने वाली है, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
जय सद्गुरु ईश्वर प्रापक हे ।भवरोग विकार विनाशक हे ॥ मन जेन रहे तव श्रीचरणे ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥८॥
उन गुरु की जय हो जो ईश्वर की ओर ले जाते हैं, जो इस संसार रूपी भवसागर की भयानक बीमारियों और विकार का विनाश करने वाले हैं, मेरा मन सदैव आपके श्री चरणों में लगा रहे, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
गुरु वंदना भवसागर तारण कारण हे -bhav sagar taran karan he lyrics
भारतीय संस्कृति में नागों का महत्वपूर्ण स्थान है। नाग भारतीय मिथोलॉजी, धार्मिकता, और कई परंपरागत कथाओं में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।नाग भारतीय धार्मिकता में देवता के रूप में माने जाते हैं। विशेष रूप से हिन्दू धर्म में नाग देवता सर्प देवता के रूप में पूजे जाते हैं। नाग पूजा का अभिषेक, आराधना, और उपासना भारत के विभिन्न हिस्सों में होती है।भारत में नाग देवता के अनेक मंदिर(Famous Nag Devta Temples) हैं।
नागों के भारतीय संस्कृति में महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि नागों के लिए नाग पंचमी नामक पर्व मनाया जाता है। इस पर्व में नागों की पूजा और आराधना की जाती है।भारत में अनेक नाग मंदिर है जिनमें से नागचंद्रेश्वर उज्जैन, नागकूप काशी , मन्नारशाला केरला आदि प्रमुख हैं। इस लेख के माध्यम से हम भारत के प्रमुख नाग मंदिरों (Famous Nag Devta Temples) की जानकारी देंगे।
Famous Nag Devta Temples Of India-भारत के प्रमुख नाग देवतामंदिर
Naag Koop Nag Devta Temple-नागकूप
नागकूप कारकोटक नागी तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है।यह काशी के जैतपुरा में स्थित है। इसकी की गहराई कितनी है यह कोई नहीं जानता। स्कंद पुराण के अनुसार यह वह स्थल है जहां से पाताल लोक जाने का रास्ता है। माना जाता है इस कूप के अंदर सात कूप हैं। नागपंचमी के पर्व पर यहां काल सर्पदोष की शांति के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगती है।
नागकूप में काशी में 100 फीट की गहराई में एक ऐसा शिवलिंग है, जिसके साल में सिर्फ एक बार नागपंचमी से 7 दिन पहले दिन दर्शन होते हैं। अगले दिन फिर यहां पूरा पानी भर जाता है। ये शिवलिंग शेषनाग के अवतार महर्षि पतंजलि द्वारा स्थापित नागकुआं में मौजूद है। इसमें पानी आने का रहस्य आज भी कोई नहीं समझ पाया है। कूप निर्माण को लेकर बताया जाता है, इसका जीर्णोद्धार संवत 1 में किसी राजा ने करवाया था। इस हिसाब से इसका समयकाल लगभग 2074 साल पुराना है।
मान्यता के अनुसार महर्षि पतंजलि ने अपने तप के लिए इस कूप का निर्माण करवाया था। इसकी सतह में उनके द्वारा स्थापित एक विशाल शिवलिंग है, जो जमीन तल से 100 फीट नीचे है। यहाँ पूजा और दर्शन साल में एक बार नागपंचमी के 7 दिन पहले कूप की सफाई के दौरान हो पाते हैं। इसके बाद साल भर यह शिवलिंग पानी डूबा रहता है। यहीं पर उन्होंने अपने गुरु पाणिनि के साथ कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की, जिसमें महाभाष्य, चरक संहिता, पतंजलि योग दर्शन प्रमुख हैं।
Nagchanderswar Nag Devta Temple–नागचंद्रेश्वर मंदिर उज्जैन
उज्जैन में स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर का अपना एक अलग महत्व है। यह मंदिर महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल में स्थिति है। ये मंदिर सालभर में सिर्फ नागपंचमी के दिन ही पूरे 24 घंटे के लिए खोला जाता है। माना जाता है कि यहां पर नागराज तक्षक स्वयं विराजित है। इस मंदिर में दर्शन करने मात्र से हर तरह के कालसर्प दोष से छुटकारा मिल जाता है।
Nagchanderswar Temple
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नागों के राजा तक्षक ने शिवजी को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दे दिया। माना जाता है कि तक्षक राजा ने प्रभु के सानिध्य में वास करना शुरू कर दिया, लेकिन महाकाल की वन में वास करने से पूर्व यहीं मंशा थी कि उनके एकांत में किसी भी तरह का विघ्य ना हो। इसी परंपरा के कारण वर्ष में सिर्फ एक बार इस मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और शेष समय कपाट बंद रहते है।
Nag Vasuki Temple Prayag-नाग वासुकि मंदिर
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में दारागंज में नागवासुकि मंदिर स्थित है। नाग वासुकि भगवान शिव के गले में सुभोभित रहते हैं। नाग पंचमी के दिन एक बड़ा मेला लगता है।ऐसा माना जाता है कि इस दौरान मंदिर में विग्रह के दर्शन मात्र से पाप का नाश होता है. वहीं, कालसर्प दोष से भी मुक्ति मिलती है.
Takshkeshwarnath Nag Devta TemplePrayag– तक्षकेश्वर नाथ मंदिर
यह मंदिर भी प्रयागराज में यमुना किनारे स्थित है। यह बहुत ही प्राचीन नाग मंदिर है। इस मंदिर के बारे में ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में भगवान शिव और नाग देवता का जो भी दर्शन करता उसे और उसके कुल को कभी भी सर्प भय और कालसर्प दोष नहीं रहता है।
Mannarasala Sree Nagaraja Kshetram-मन्नारशाला
मन्नारसला श्री नागराज क्षेत्रम दक्षिण-पश्चिम केरल में स्थित एक प्राचीन तीर्थस्थल है। दुनिया में नाग पूजा के सभी स्थानों में से, मन्नारसला से अधिक सौम्य, विस्मयकारी और पौराणिक कोई नहीं है, जैसा कि केरल के निर्माता भगवान परशुराम ने आशीर्वाद दिया और कल्पना की थी। यह 30 हजार नागों वाला मंदिर है। जहां पर नागों की मूर्तियां है। यह मंदिर 16 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस मंदिर में नागराज तथा उनकी जीवन संगिनी नागयक्षी देवी की प्रतिमा स्थित है।
Sem Mukhem Nagraja Nag Devta Temple-सेम-मुखेम नागराजा मंदिर
सेम-मुखेम नागराजा मंदिर उत्तराखंड के टिहरी में स्थित है । मान्यता है कि द्वारिका नगरी डूबने के बाद भगवान श्रीकृष्ण यहां नागराज के रूप प्रकट हुए थे। मन्दिर के गर्भगृह में नागराजा की स्वयं भू-शिला है।अधिक जानकारी यह लेख पढ़ें -Sem Mukhem Nagraja /सेम मुखेम मंदिर की पूरी जानकारी
Bhujang Nag Temple, Gujarat-भुजंग नाग मंदिर, गुजरात
यह भव्य मंदिर गुजरात के कच्छ जिले में है। किंवदंतियों के अनुसार, भुज के बाहरी इलाके में स्थित भुजिया किला अंतिम नागा कबीले, भुजंगा को समर्पित है। बाद में, स्थानीय लोगों ने उन्हें सम्मान देने के लिए भुजिया पहाड़ियों पर एक मंदिर बनाया। नागा पंचमी के दौरान भुजंग नागा मंदिर के पास मेला लगता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि भुजंग नागा काठियावाड़ के थान से आए थे और उन्होंने कच्छ को दैत्यों और राक्षसों के दमनकारी शासन से मुक्त कराया था।
Nagaraja Temple, Tamil Nadu-नागराजा मंदिर, तमिलनाडु
नागों और देवताओं की कई उत्कृष्ट नक्काशीदार मूर्तियों वाला यह मंदिर तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के नागरकोइल में है। इसके दो मुख्य देवता हैं – भगवान कृष्ण और नागराज या नागों के राजा भगवान वासुकी। नागराज की मूर्ति के पाँच सिर या फण हैं। किंवदंती है कि एक बार जब एक लड़की घास काट रही थी तो गलती से पांच सिर वाले सांप से टकरा गई। लड़की ने घटना के बारे में गांव वालों को बताया और उन्होंने उस स्थान पर एक मंदिर बना दिया।
यह मंदिर 1000-2000 साल पुराना है। भगवान नागराज स्वयंभूमूर्ति हैं और जमीन के स्तर से नीचे हैं। उसके पांच सिर हैं और वह जहां बैठता है वह स्थान गीला और केसरिया रंग का है। ऐसा उस खून के कारण है जो कथित तौर पर मूर्ति के सिर से निकला था। यहां का प्रसाद अनोखा है. यह “मन्नू” या रेत है। भक्त दूध और हल्दी चढ़ाते हैं। ब्रह्मोत्सवम, अवनि आश्लेषा, कृष्ण जयंती, नवरात्रि और तिरुकार्तिकई इस मंदिर के प्रमुख त्योहार हैं।
Kukke Subramanya Temple, Karnataka-कुक्के सुब्रमण्यम मंदिर, कर्नाटक
इस मंदिर में लोग भगवान सुब्रमण्यम, भगवान वासुकी और भगवान शेष की पूजा करते हैं। इसके चारों ओर सुरम्य कुमार पर्वत शिखर है, और मंदिर कुमारधारा नदी के तट पर स्थित है। कहानी यह है कि भगवान वासुकी और अन्य सांपों ने सुब्रमण्यम की गुफाओं में आश्रय लिया था। जिन लोगों को कालसर्प दोष होता है वे इससे छुटकारा पाने के लिए इस मंदिर में पूजा करते हैं।
Sheshnag Temple, Jammu & Kashmir-शेषनाग मंदिर, जम्मू और कश्मीर
यह मंदिर मानसर झील के पूर्वी तट पर स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, शेषनाग ने पहलगाम के पास एक झील बनाई थी। स्थानीय लोगों का मानना है कि शेषनाग आज भी यहां रहते हैं। उन्होंने इसके तट पर उनके लिए एक मंदिर भी बनवाया। अमरनाथ गुफा जाने वाले तीर्थयात्री मंदिर में जाकर शेषनाग की पूजा करते हैं।
FAQ
काल सर्प दोष क्या होता है
किसी जातक जन्म कुंडली में, राहु और केतु को हमेशा एक दूसरे से सात भाव की दूरी पर होते है। जब सभी ग्रह इन सात घरों के भीतर आते हैं और बाकी पांच घर खाली रहते हैं, तो यह काल सर्प दोश बनाता है। यह वैदिक ज्योतिष में अशुभ माना जाता है। अपनी जन्म पत्रिका का विश्लेषण करते समय, यह देखना आवश्यक है कि क्या कोई ग्रह वास्तव में राहु से केतु तक के सात घरों के भीतर आता है। यह दोश विवाह, कैरियर, वित्त, स्वास्थ्य और बच्चों सहित सभी पहलुओं में जीवन में बहुत संघर्ष का कारण बनता है। राहु और केतु की स्थिति के आधार पर, 12 प्रकार के काल सरप दोशा को जाना जाता है। वे निम्न हैं: अनंत कालसर्प दोष, कुलिक कालसर्प दोष, वसुकी कालसर्प दोष, संखापल कालसर्प दोष, पद्म कालसर्प दोष, महा पद्म कालसर्प दोष, तक्षक कालसर्प दोष, कर्कोटक कालसर्प दोष, शंकचुड कालसर्प दोष, घातक कालसर्प दोष, विषधर कालसर्प दोष, शेषनाग कालसर्प दोष
Nag Panchami हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहारों में से है। हिन्दू पंचांग के अनुसार सावन माह की कृष्ण पक्ष के पंचमी को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता या सर्प की पूजा की जाती है और उन्हें दूध से स्नान कराया जाता है।
श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पंचमी कहते हैं। इस दिन नागों की पूजा की जाती है। गरुण पुराण में ऐसा कहा गया है कि नाग पंचमी(Nag Panchami) के दिन घर के दोनों बगल में नाग देवता की मूर्ति खींचकर अनन्तर प्रमुख महानागों का पूजन किया जाना चाहिए।
पंचमी नागों की तिथि है ,ज्योतिष के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग हैं। इसलिए शेष आदि सर्पराजों का पूजन पंचमी को होना चाहिए। सुंगंधित पुष्प तथा दूध सर्पों को अति प्रिय हैं। गाँवो में इस दिन को नागचैयां भी कहते हैं। इस दिन ग्रामीण लड़कियां किसी जलाशय में गुड़ियों का विसर्जन करती हैं। ग्रामीण बच्चे तैरती हुई इन निर्जीव गुड़ियों को पीटते हैं। तत्पश्चात बहन उन्हें रुपयों की भेंट तथा आशीर्वाद देती हैं।
Nag Panchami Tithi Aur Puja Muhurt-नाग पंचमी तिथि और पूजा का मुहूर्त
नाग पञ्चमी सोमवार, 29जुलाई, 2023 नाग पञ्चमी पूजा मूहूर्त – 05:29 ए एम से 08:11 ए एम अवधि – 02 घण्टे 42 मिनट्स
पञ्चमी तिथि प्रारम्भ – 28 जुलाई, 2023 को 11:24 पी एम पञ्चमी तिथि समाप्त – 29 जुलाई , 2023 को 12:46 पी एम
Nag Panchami Katha-नाग पंचमी कथा
प्राचीन काल की दन्त कथाओं से ज्ञात होता है कि किसी ब्राह्मण की सात पुत्रवधुयें थीं। सावन मास लगते ही छः बहुएं तो भाई के साथ मायके चली गईं परन्तु सातवीं बहु का कोई भाई ही न था तो बुलाने कौन आता। बेचारी ने अति दुःखी होकर पृथ्वी को धारण करने वाले शेष नाग को भाई रूप में याद किया।
करुणा युक्त दीन वाणी सुनकर शेष जी वृद्ध ब्राह्मण के रूप में आये और उसे लिवाकर चल दिये। थोड़ी दूर रास्ता तय करने पर उन्होंने अपना असली रूप धारण कर लिया। तब फन पर बैठा कर नागलोक ले गये। वहाँ वह निश्चिन्त होकर रहने लगी। पाताल -लोक में जब वह निवास कर रही थी उसी समय शेष जी की कुल परम्परा में नागों के बहुत से बच्चों ने जन्म लिया।
उन नाग बच्चों को सर्वत विचरण करते देख शेष -नागरानी ने उस वधू को पीतल का एक दीपक दिया तथा बताया कि इसके प्रकाश से तुम अँधेरे में भी सब कुछ देख सकोगी। एक दिन अकस्मात उसके हाथ से दीपक नीचे टहलते हुए नाग बच्चों पर गिर गया। परिणाम स्वरूप उन सबकी थोड़ी पूंछ कट गई।
यह घटना घटित होते ही कुछ समय बाद वह ससुराल भेज दी गई। जब अगला सावन आया तो वह वधू दीवार पर नागदेवता को उरेहकर उनकी विधिवत पूजा तथा मंगल कामना करने लगी। इधर क्रोधित नाग बालक माताओं से अपनी पूंछ काटने का आदिकारण इस वधू को मानकर बदला लेने के लिए आये थे। लेकिन अपनी ही पूजा में श्रद्धा वनत उसे देखकर वे सब प्रसन्न हुए और उनका क्रोध समाप्त हो गया।
बहन स्वरूपा उस वधू के हाथ से प्रसाद के रूप में उन लोगों ने दूध तथा चावल भी खाया। नागों ने उसे सर्पकुल से निर्भय होने का वरदान दिया तथा उपहार में मड़ियों की माला दी।
उन्होंने यह भी बताया की श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को हमें भाई के रूप में जो भी पूजेगा हम उसकी रक्षा करते रहेंगे।
Nagpanchami Ka Mahatva-नाग पंचमी का महत्व
हिन्दू धर्म में नागों को विशेष स्थान प्राप्त है। इनका इतना अधिक महत्त्व है कि महादेव स्वयं वासुकि नामक नाग को अपने गले में धारण करते हैं तथा जगत के पालनहार भगवान विष्णु शेष शैय्या पर विराजमान रहते हैं। नाग शब्द संस्कृत और पालि का शब्द है जो भारतीय धर्मों में महान सर्प को दर्शाता है । नाग दिव्य या अर्ध-दिव्य देवता हैं।हिन्दू मान्यताओं में अष्टनागों का वर्णन मिलता है जिनका बहुत महत्व है।
Ashtnaag-अष्टनाग
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार अष्टनाग हैं – अनंत (शेष), 2. वासुकी, 3. तक्षक, 4. कर्कोटक, 5. पद्म, 6. महापद्म, 7. शंख और 8. कुलिक।
शेषनाग -कहा जाता है कि इनके के फन पर धरती टिकी हुई है यह पाताल लोक में ही रहते हैं। चित्रों में अक्सर हिंदू देवता भगवान विष्णु को शेषनाग पर लेटे हुए चित्रित किया गया है।मान्यता है कि शेषनाग के हजार मस्तक हैं। इनका कही अंत नहीं है इसीलिए इन्हें ‘अनंत’ भी कहा गया है।
वासुकि -शेषनाग के भाई वासुकि को भगवान शिव के सेवक थे। नागों के दूसरे राजा वासुकि का इलाका कैलाश पर्वत के आसपास का क्षेत्र था। पुराणों अनुसार वासुकि नाग अत्यंत ही विशाल और लंबे शरीर वाले माने जाते हैं। समुद्र मंथन के दौरान देव और दानवों ने मंदराचल पर्वत को मथनी तथा वासुकी को ही नेती (रस्सी) बनाया था। त्रिपुरदाह के समय वह शिव के धनुष की डोर बने थे।
तक्षक ने शमीक मुनि के शाप के आधार पर राजा परीक्षित को डंसा था। उसके बाद परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने नाग जाति का नाश करने के लिए नाग यज्ञ करवाया था। माना जाता है कि तक्षक का राज तक्षशिला में था।
कर्कोटक– कर्कोटक और ऐरावत नाग कुल का इलाका पंजाब की इरावती नदी के आसपास का माना जाता है। कर्कोटक शिव के एक गण और नागों के राजा थे। नारद ऋषि के शाप से वे एक अग्नि में पड़े थे, लेकिन नल ने उन्हें बचाया और कर्कोटक ने नल को डस लिया, जिससे राजा नल का रंग काला पड़ गया। लेकिन यह भी एक शाप के चलते ही हुआ तब राजा नल को कर्कोटक वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए। शिवजी की स्तुति के कारण कर्कोटक जनमेजय के नाग यज्ञ से बच निकले थे और उज्जैन में उन्होंने शिव की घोर तपस्या की थी। कर्कोटेश्वर का एक प्राचीन उपेक्षित मंदिर आज भी चौबीस खम्भा देवी के पास कोट मोहल्ले में है। वर्तमान में कर्कोटेश्वर मंदिर हरसिद्धि के प्रांगण में है।
पद्म – पद्म नागों का गोमती नदी के पास के नेमिश नामक क्षेत्र पर शासन था। बाद में ये मणिपुर में बस गए थे। असम के नागावंशी इन्हीं के वंश से है।
महापद्म– विष्णुपुराण में सर्प के विभिन्न कुलों में महापद्म का नाम भी आया है। पद्म और महापद्म नाग कुल में विशेष प्रीति थी।
शंख– नागों के 8 मुख्य कुलों में से एक है। शंख नागों पर धारियां होती हैं। यह जाति अन्य नाग जातियों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान मानी जाती थी।
कुलिक– कुलिक नाग जाति नागों में ब्राह्मण कुल की मानी जाती है जिसमें अनंत भी आते हैं। ये अन्य नागों की भांति कश्यप ऋषि के पुत्र थे लेकिन इनका संबंध सीधे ब्रह्माजी से भी माना जाता है।
नाग पंचमी के पावन पर्व पर वाराणसी (काशी) में नाग कुआँ मंदिर, नागचंद्रेश्वर मंदिर उज्जैन, नाग वासुकि मंदिर, तक्षेश्वर मंदिर आदि मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है और मेला लगता है। इनमें से कुछ मंदिरों में दर्शन मात्र से कालसर्प दोष की शांति हो जाती है।
नागचंद्रेश्वर मंदिर उज्जैन
आइए कुछ प्रमुख नाग मंदिरो के विषय में जानते हैं।भारत के प्रमुख नाग मंदिरो के विषय में जानने के लिए निम्न लेख पढ़ें।
सर्वे नागाः प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथ्वीतले. ये च हेलिमरीचिस्था येऽन्तरे दिवि संस्थिताः॥ ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिनः. ये च वापीतडगेषु तेषु सर्वेषु वै नमः॥
अर्थ – इस संसार में, आकाश, स्वर्ग, झीलें, कुएँ, तालाब तथा सूर्य-किरणों में निवास करने वाले सर्प, हमें आशीर्वाद दें तथा हम सभी आपको बारम्बार नमन करते हैं ।
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्. शङ्ख पालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा॥ एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्. सायङ्काले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः. तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्॥
अर्थ – नौ नाग देवताओं के नाम अनन्त, वासुकी, शेष, पद्मनाभ, कम्बल, शङ्खपाल, धृतराष्ट्र, तक्षक तथा कालिया हैं. यदि प्रतिदिन प्रातःकाल नियमित रूप से इनका जप किया जाता है, तो नाग देवता आपको समस्त पापों से सुरक्षित रखेंगे तथा आपको जीवन में विजयी बनायेंगे ।
Shri Krishnashtakam भगवान श्री कृष्ण के गुणगान में लिखे गए आठ श्लोकों का संग्रह है। इसका पाठ भगवान श्री कृष्ण की कृपा पाने और जन्माष्टमी जैसे शुभ अवसरों पर किया सकता है। जो लोग शनि ग्रह की पीड़ा से ग्रसित हो या जिनका चन्द्रमा कमजोर हो उन्हें भी इस सुन्दर स्तोत्र द्वारा भगवान श्री कृष्ण का पूजन करना चाहिए।
मैं नटखट भगवान कृष्ण की वंदना करता हूं, जो व्रज का अमूल्य गहना है, जो सभी पापों का विनाश कर देते हैं, जो सदैवअपने भक्तों को को प्रसन्न करते है, बाबा नंद के घर का आनंद, जिनके सिर पर मोर पंख सुशोभित है, भगवान कृष्ण की मधुर-मीठी आवाज़ है, उनके हाथ में बांसुरी और जो प्रेम के सागर है।
मैं उन भगवान भगवान कृष्ण की वंदना करता हूं, जो मनुष्य के अन्दर अभिमान और काम से छुटकारा दिलाते हैं, ऐसे प्रभि के पास सुंदर और बड़ी आंखें हैं, जो गोपालों (चरवाहों) के दुखों को दूर करते हैं। मैं उन भगवान कृष्ण को प्रणाम करता हूं जिन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपने हाथ की तर्जनी ऊँगली से उठाया, जिनकी मुस्कान और एक झलक अत्यंत आकर्षक है, जिन्होंने इंद्र के घमंड को नष्ट कर दिया था(गोवर्धन पर्वत को उठाकर गोकुल वासियों की इन्द्र से रक्षा की थी। )|
कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलं, व्रजाङ्गनैकवल्लभं नमामि कृष्ण दुर्लभम् । यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया, युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम् ॥ ३ ॥
मैं उन भगवान कृष्ण को नमन करता हूं, जो कदंब के फूलों से बने कुण्डल पहनते हैं, जिनके सुंदर लाल गाल हैं, जो ब्रज के गोपियों के एकमात्र प्राण से भी प्रिय सखा हैं, और जिन्हें भक्ति के अलावा और किसी भी तरह से प्राप्त करना मुश्किल है। मैं भगवान भगवान भगवान कृष्ण को नमन करता हूं, जो ग्वालों, नन्द बाबा और माता यशोदा के प्रिय हैं, जो अपने भक्तों को खुशी के अलावा कुछ नहीं देते है और जो ग्वालों के भगवान हैं।
सदा ही पवित्र चरण कमल वाले मेरे(मदीय) मानस (हृदय में ) में स्थापित करने वाले। मैं श्री कृष्ण जिनके चरण कमल अत्यंत ही शुभ हैं उन्हें मेरे हृदय में स्थापित करने वाले, कृष्ण को नमन करता हूँ। जिनके घुंघराले बाल हैं,जिनके बालों सुन्दर घुंघराले हैं। मैंने ऐसे नन्द के शिशु को नमन करता हूँ। जो समस्त दोष, अवगुण का नाश करने वाले हैं और समस्त जन के पोषण करने वाले हैं, जग पालक हैं मैं उन्हें नमन करता हूँ। जो समस्त गोप जन के मानस (चित/हृदय) में, नन्द के हृदय में आनंदस्वरूप हैं, मैं ऐसे श्री कृष्ण को नमन करता हूँ।
भुवोभरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकं, यशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम् । दृगन्तकान्तभङ्गिनं सदासदालसङ्गिनं, दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसंभवम् ॥ ५ ॥
मैं भगवान कृष्ण को नमन करता हूं, जो पृथ्वी पर होने वाले अधर्म कार्य को रोकते है और धरम की रक्षा करते है, जो हमें दुखों के सागर को पार करने में सहायक है, जो मईया यशोदा के लाल है, और इनकी मनमोहक अदाएं और मुस्कान सभी के दिलों को भा जाती है। मैं नन्द के के बेटे को नमन करता हूं, जिसके पास बेहद सुन्दर और आकर्षक आंखें हैं, जो हमेशा संत और भक्तजनों के साथ है, और जिसके दिन-प्रतिदिन नए रूप दिखाई देते हैं।
समस्त गुणों से युक्त सुख प्रदान करने वाले, सदैव ही कृपा करने, परम कृपा करने वाले, देवताओं के शत्रुओं को नष्ट करने वाले, गोपनन्दन को नमन है। जो नवीन गोप में चतुर हैं, जो नित्य नवीन क्रीड़ा करते हैं,जो काले मेघ के समान सुन्दर, जो चमकती बिजली के समान पीतांबर धारण करने वाले श्री कृष्ण को नमन करता हूँ।
भगवान कृष्ण सभी ग्वालों को प्रसन्न करते हैं और हृदय रूपी अम्बुज को प्रसन्न करने वाले, हृदय रूपी कुञ्ज में खेलने वाले, आनंदित, सूर्य से प्रकाशित श्री कृष्ण को नमन। मैं ऐसे भगवान को नमन करता हूं, जो पूरी तरह से भक्त की इच्छाओं को पूरा करते हैं, जिनकी सुंदर झलक तीर के समान दिल में उतरती है और जो बांसुरी पर मधुर धुन बजाते हैं।
चतुर गोप गोपिकाओं के मन रूपी शैया पर वास करने वाले, बृज के भकजनों के विरह अग्नि का पान करने वाले भगवान श्री कृष्ण को नमन है। अपनी किशोर अवस्था से आभा को बांटने वाले, जिनके नेत्रों में काजल शोभित है। भगवान् श्री कृष्ण जो गजराज को मोक्ष प्रदान करने वाले हैं(गजेंद्र की करूण पुकार को सुनकर भगवान विष्णु ने उन्हें मगरमच्छ की पकड़ से मुक्त कराया था ), जो श्री अर्थात माता लक्ष्मी के साथ विहार करने वाले हैं, ऐसे श्री कृष्ण को नमन।
मैं जहाँ पर जैसी भी परिस्थिति में रहूं, मैं वहां पर श्री कृष्ण की सत्कथा का गायन करता रहूं, हे ईश्वर ऐसी कृपा बनी रहे। हे श्री कृष्ण मुझ पर आप ऐसी कृपा करो की मैं हर हालात में आपके यश का गान करता रहूं। जो कोई भी इस अष्टक का गान करता है, वाचन करता है, वह प्रत्येक जन्म में श्री कृष्ण की करुणा ,आशीर्वाद और भक्ति को प्राप्त करता है।
Ekadashi Vrat Ka Khana हिंदू पञ्चाङ्ग की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहते हैं। यह तिथि मास में दो बार आती है – पूर्णिमा में उपरान्त कृष्ण पक्ष की एकादशी और अमावस्या के उपरान्त शुक्ल पक्ष की एकादशी इन दोनों प्रकार की एकादशियोँ का हिन्दू धर्म में बहुत महत्त्व है। एकादशी के दिन व्रत रखना बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन अन्न का निषेध होता है विशेषकर चावल का। जो लोग व्रत नहीं भी रखते हैं उन्हें भी इस दिन चावल नहीं खाना चाहिए।
इस लेख के माध्यम से हम एकादशी व्रत में किए जाने वाले भोजन के विषय में जानकारी देने का प्रयास कर रहे हैं।
भक्त अपनी इच्छा शक्ति और शारीरिक शक्ति के अनुसार संकलप के दौरान एकादशी उपवास के प्रकार का फैसला कर सकते हैं। धार्मिक ग्रंथों में चार प्रकार के एकादशी व्रत का उल्लेख किया गया है।
1. निर्जला व्रत
इस प्रकार के व्रत में जल भी ग्रहण नहीं किया जाता है। अधिकांश भक्त निर्जला एकादशी के दौरान इस उपवास को करते हैं। हालांकि भक्त सभी एकादशी उपवास प्रकार कर सकते हैं। पर क्योंकि निर्जला व्रत अत्यंत कठिन होता है। अतः इस व्रत को सामान्य गृहस्थ लोगों को नहीं रखना चाहिए। जिन लोगों को किसी भी प्रकार का रोग है उन्हें निर्जला व्रत नहीं रखना चाहिए।
2. क्षीरभोजी
क्षीरभोजी अर्थात् सिर्फ क्षीर पर एकादशीव्रत। क्षीर दूध और पौधों के दूधिया रस को दर्शाता है। लेकिन एकादशी संदर्भ में यह सभी उत्पादों को दूध से बने होना चाहिए।इस प्रकार के व्रत में दूध, दूध की बनी मिठाई, दही, छाछ आदि का सेवन करना चाहिए। यदि देशी गाय के दूध का उपयोग किया जाए तो यह सर्वश्रेष्ठ होता है।
3.फलाहार
फलाहार यानी एकादशी केवल फलों पर उपवास करना। आम को आम, अंगूर, केला, बादाम और पिस्ता आदि जैसे फलों के केवल उच्च वर्ग का उपभोग करना चाहिए और पत्तेदार सब्जियां नहीं खाना चाहिए।
4. नक्तभोजी
नक्त भोजन का अर्थ होता है पूरे दिन कुछ न खाकर सूर्यास्त के बाद तीन घड़ियों (संध्याकाल) को छोड़कर रात्रि में एक बार भोजन करना। इस भोजन में बीन्स, गेहूं, चावल और दालों सहित किसी भी तरह के अनाज और अनाज नहीं होने चाहिए, जो एकादशी व्रत के दौरान निषिद्ध हैं।
एकादशी व्रत के दौरान नक्तभोजी के लिए आहार में साबूदाना, सिंघाड़ा , शकरकंद , मखाना, आलू , रामदाना और मूंगफली शामिल हैं।
कई लोग कुट्टू अट्टा और समक (बाजरा चावल) भी लेते हैं। हालांकि एकादशी भोजन के रूप में दोनों वस्तुओं की वैधता बहस का विषय है क्योंकि उन्हें अर्ध-दाने या छद्म अनाज माना जाता है। अतः उपवास के दौरान इन वस्तुओं से बचना बेहतर है।
हम कुछ ऐसे खाद्य वस्तुओं के विषय में बता रहें हैं जिन्हें व्रत में खाया जा सकता है तथा ये पौष्टिक भी होती हैं।
Sabudana-साबूदाना
Ekadashi Vrat Ka Khana-SabudanaVadaSabudana KheerSabudana Papad
साबूदाना एक खाद्य पदार्थ है। यह छोटे-छोटे मोती की तरह सफ़ेद और गोल होते हैं।भारत मे यह कसावा/टेपियोका की जडों से व अन्य अफ्रीकी देशों मे सैगो पाम नामक पेड़ के तने के गूदे से बनता है। भारत में जब लोग में साबूदाने के विभिन्न प्रकार के व्यंजन जैसे साबूदाना खिचड़ी, साबूदाना पापड़, साबूदाने की खीर, साबूदाना वड़ा आदि बनाकर खाते हैं। साबूदाने में मुख्यतः कार्बोहिड्रेट्स और कैल्सियम होता है। यह आसानी से पच जाता है और जल्दी ऊर्जा देता है।
Makhana-मखाना
Makhana MixMakhana Kheer
मखाना के बीज का उपयोग उत्तर भारत में विशेष रूप से होता है और इसे विभिन्न स्वादिष्ट व्यंजनों जैसे मखाने की खीर, रोस्टेड मखाना आदि में उपयोग किया जाता है। मखाना गुणकारी होता है और कई पोषक तत्वों से भरपूर होता है। यह उच्च प्रोटीन, लो वसा, कार्बोहाइड्रेट्स, फाइबर, विटामिन, और खनिजों का भंडार होता है। मखाने का उपयोग व्रत के भोजन में होता है, क्योंकि यह व्रती भोजन के लिए स्वस्थ और पौष्टिक विकल्प प्रदान करता है।
Rajgira-रामदाना/राजगिरा
Ekadashi Vrat Ka Khana-Rajgira Laddo
रामदाना (Ramdana) को राजगिरा भी कहा जाता है। व्रत में राजगिरी के आटे (rajgiri ka Atta) का परांठा या हलवा बनाकर खाया जाता है। व्रत में रामदाने का लड्डू (rajgira ladoo) और खीर भी बनाकर खाई जाती है। रामदाना पौष्टिकारक होने के कारण इसके अनगिनत फायदे हैं, इसलिए उपवास के समय ज्यादातर इसका सेवन किया जाता है। इसके सेवन से शरीर में प्रोटीन की कमी पूरी होती है एवं शरीर में ऊर्जा बनी रहती है।
Singhara-सिंघाड़ा
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सिंगाड़ा (Singhara) एक ऐसा फल है जो त्रिकोण आकार का और दो सिंग वाला होता है। लेकिन इसके अनोखे आकार की तरह फायदे भी अनगिनत होते हैं। सिंगाड़ा (Water caltrop, Water Chestnut) मूल रुप से सर्दी के मौसम में पाया जाता है। इसको छील कर इसके गूदे को सुखाकर और फिर पीसकर जो आटा बनाया जाता है उस आटे से बनी खाद्य वस्तुओं जैसे- सिंघाड़े की पूरी , सिंघाड़े का हलवा, सिंघाड़े की कतली आदि का भारत में लोग व्रत उपवास में सेवन करते हैं क्योंकि इसे एक अनाज नहीं वरण एक फल माना जाता है।
Shakarkand-शकरकंद
शकरकंद(Sweet Potato) खाना सेहत के लिए फायदेमंद है और इसे व्रत में खाया भी जा सकता है। शकरकंद पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसकी भूनकर खाया जा सकता है। इसके अलावा इसे भूनकर इसकी खीर बनाकर खाना एक अच्छा विकल्प हो सकता है। सर्दियों में शकरकंद खाने से सर्दियों से भी बचाव होता है।
Dry Fruits-सूखे मेवे
Cashew-काजूAlmonds-बादामWalnut-अखरोट
व्रत के दौरान दिन में एक या दो बार सूखे मेवे का सेवन करें। इसमें काजू, बादाम, मूंगफली, पिस्ता, अखरोट, किशमिश, खजूर, छुहारा आदि शामिल करें। इससे पोषक तत्व भी मिलेंगे और ऊर्जा भी बनी रहेगी। सूखे मेवे के लड्डू या पाग बना कर भी खा सकते हैं।
एकादशी व्रत में क्या न खाएं
एकादशी व्रत रखने वाले लोगों को दशमी के दिन से ही सात्विक भोजन करना चाहिए। भोजन में बैंगन, मसूर की दाल, गाजर, मूली, लहसुन, प्याज, चावल आदि नहीं खाना चाहिए। व्रत के दिन अपने संकल्प के अनुसार व्रत का भोजन करना चाहिए तथा पारण के दिन भी सात्विक भोजन ही करना चाहिए।