गणेश जी को भगवान गणेश, गणपति, विनायक या विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता हैं। उन्हें हिन्दू धर्म के महत्वपूर्ण देवता (Ganesh Ji Ke 8 Avatar) के रूप में पूजा जाता है। गणेश जी को भक्ति, विद्या और समृद्धि के देवता के रूप में पूजे जाता है। उन्हें “विघ्नहर्ता” अर्थात विघ्नों को हरने वाला कहते है, जो किसी भी काम या क्रिया में आने वाली कठिनाइयों और विघ्नों को दूर करने में मदद करते हैं। गणेश जी को सबसे पहले “विघ्नहर्ता” के रूप में पूजने की परंपरा है, ताकि उनकी कृपा से सभी विघ्नों से मुक्ति मिले।
भगवान गणेश के अनेक अवतार हुए हैं पर उसमें से आठ अवतार (Ganesh Ji Ke 8 Avatar) प्रमुख हैं – वक्रतुण्ड, एकदन्त, महोदर, गजानन, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज और धूम्रवर्ण। गणेश पुराण में भी सूतजी ने शौनक जी को गणेश जी 8 अवतारों का वर्णन किया है जो की निम्न हैं ।
हे शौनक ! भगवान गणेश का वक्रतुंड अवतार देह ब्रह्म का धारक है। उनके द्वारा मत्सरासुर का संहार हुआ था। वे भगवान सिंह पर आरूढ़ होने वाले कहे गए हैं।
Ganesh Ji Ke 8 Avatar
Ekdant-एकदन्त
एकदन्तावतारो वै देहिनां ब्रह्मधारकः।
मदासुरस्य हन्ता स आखुवाहनगः स्मृतः।।
एकदन्त संज्ञक अवतार देही ब्रह्म को धारण करने वाला और मदासुर का संहारक है। हे शौनक उनका वाहन मूषक कहा जाता है।
Mahodar-महोदर
महोदर इति ख्यातो ज्ञान ब्रह्म प्रकाशकः।
मोहासुरस्य शत्रुवै आखुवाहनगः स्मृतः।।
हे शौनक महोदर नाम से विख्यात गणेश जी का अवतार ज्ञान ब्रह्म का प्रकाश करने वाला है। उन मूषक वाहन को मोहासुर का वध करने वाला कहा जाता है।
Gajanan-गजानन
गजाननः स विज्ञेयः सांख्येभ्यः सिद्धिदायकः।
लोभासुरप्रहर्ता वै आखुगश्च प्रकीर्तितः।।
हे शौनक गणेश जी का जो अवतार गजानन नाम से जाना जाता है वह सांख्य योगियों के लिए सिद्धि देने वाला है। क्योंकि वह सांख्य ब्रह्म का धारक है। उस अवतार में उन्होंने लोभासुर का विशेष रूप से संहार किया। उस अवतार को भी विद्वान् लोग मूषक वाहन कहते हैं।
Lambodar-लम्बोदर
लम्बोदरावतारो वै क्रोधासुरनिवर्हणः।
शक्तिब्रह्माखुगः सत् तत् धारक उच्चयते।।
हे शौनक लम्बोदर नामक अवतार में गणेश जी ने क्रोधासुर का संहार किया है। यह अवतार ब्रह्म की सत्य स्वरूपा शक्ति का धारक कहा गया है। इसमें भी उनका वाहन मूषक रहा।
Vikat-विकट
विकटो नाम विख्यातः कामासुरविदारकः।
मयूरवाहनाश्चायं सौरब्रह्मधरः स्मृतः।।
हे शौनक गणेश जी के विकट अवतार द्वारा कामासुर का संहार हुआ। ये प्रभु सौरब्रह्म को धारण करने वाले मयूरवाहन कहे जाते हैं।
Ganesh Ji Ke 8 Avatar Vikat
Vighnaraj-विघ्नराज
विघ्नराजावतारश्च शेषवाहन उच्यते।
ममतासुरहन्ता स विष्णुब्रह्मेति वाचकः।।
हे शौनक भगवान गणपति का जो विघ्नराज नामक अवतार है वह शेषवाहन कहा जाता है। वह ममतासुर का संहारक और विष्णु-ब्रह्मा का वाचक है।
Ganesh Ji Ke 8 Avatar Vighnraj
Dhumravarn-धूम्रवर्ण
धूम्रवर्णावताराश्चाभिमानासुरनाशकः।
आखुवाहनश्चासौ शिवात्मा तु स उच्यते।।
हे शौनक गणेश जी का धूम्रवर्ण नामक जो अवतार हुआ उसके द्वारा अभिमान नामक असुर का नाश हुआ था। वे प्रभु शिव ब्रह्म स्वरूप एवं मूषक वाहन कहे जाते हैं।
Ganesh Ji Stuti Mantra
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटी समप्रभा। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येशु सर्वदा॥
घुमावदार सूंड वाले, विशाल शरीर काय, करोड़ सूर्य के समान महान आभा है । हमेशा मेरे सारे कार्य हमेशा बिना विघ्न के संपन्न हो, हे देव ऐसी कृपा करें।
हे हाथी के मुख वाले, भूत गणों के द्वारा सेवा किए जाने वाले, आप कपिथा (कैथा) जाम्बु /जामुन को चाव से ग्रहण करने वाले हैं। उमा अर्थात पार्वती जी के पुत्र ,आप समस्त दुखो को समाप्त करते हैं। मैं विघ्न को दूर करने वाले श्री गणेश जी के चरण कमल को नमन करता हूँ।
“भवसागर तारण कारण हे।”(Bhav Sagar Taran Karan He Lyrics) गुरु को समर्पित वंदना है। इस लेख के माध्यम से हम इस कर्णप्रिय गुरु वंदना के बोल और उसका अर्थ आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहे हैं।
महिमा तव गोचर शुद्ध मने ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥७॥
जय सद्गुरु ईश्वर प्रापक हे ।भवरोग विकार विनाशक हे ॥
मन जेन रहे तव श्रीचरणे ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥८॥
Bhav Sagar Taran Karan He Lyrics
Bhav Sagar Taran Karan He Lyrics With Meaning
भवसागर तारण कारण हे ।रविनन्दन बन्धन खण्डन हे ॥ शरणागत किंकर भीत मने ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥१॥
जो इस संसार रूपी भवसागर से तारने के कारण हैं, जो बंधन को खंडित(तोड़ने) करने वाले हे रवि पुत्र , इस संसार से भयभीत आपकी शरण में आया हूँ, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
हृदिकन्दर तामस भास्कर हे ।तुमि विष्णु प्रजापति शंकर हे ॥ परब्रह्म परात्पर वेद भणे ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥२॥
हे हृदय रूपी गुहा के अंधकार को दूर करने वाले भास्कर, तुमही विष्णु, प्रजापति(ब्रह्मा) और शिव हो, वेद तुम्हे ही परम ब्रह्म बताते हैं, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
मनवारण शासन अंकुश हे ।नरत्राण तरे हरि चाक्षुष हे ॥ गुणगान परायण देवगणे ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥३॥
हे भटकते हुए मन पर अंकुश, जो लोगों की रक्षा करने वाले साक्षात हरि का स्वरूप हैं, जिसका देवता भी गुणगान करते हैं, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
कुलकुण्डलिनी घुम भंजक हे ।हृदिग्रन्थि विदारण कारक हे ॥ मम मानस चंचल रात्रदिने ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥४॥
हे जो सोई हुई कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करने वाले हैं, हे हृदय की गांठों को खोलने वाले, मेरा मन दिन-रात चंचल है, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
रिपुसूदन मंगलनायक हे ।सुखशान्ति वराभय दायक हे । त्रयताप हरे तव नाम गुणेगुरुदेव दया करो दीनजने ॥५॥
जो शत्रुओं का नाश करने वाले और मंगल करने वाले है, जो सुख, शांति, वर और अभय प्रदान करते हैं, आपके नाम के प्रभाव से तीनों ताप आध्यात्मिक, अधिदैविक, अधिभौतिक ताप का नाश होता है, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
अभिमान प्रभाव विमर्दक हे ।गतिहीन जने तुमि रक्षक हे ॥ चित शंकित वंचित भक्तिधने ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥६॥
जो हमारे अंदर के अभिमान का विमर्दन(नष्ट) करने वाले, गतिहीन जनों को अपनी शरण में लेने वाले, मेरा मन हमेशा इस बात से भयभीत रहता है कि मैं आपकी भक्ति से वंचित न हो जाऊं, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
तव नाम सदा शुभसाधक हे ।पतिताधम मानव पावक हे ॥ महिमा तव गोचर शुद्ध मने ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥७॥
आपका नाम सदैव शुभता को बढ़ाने वाला है, आप पापी जनों को पवित्र करते हैं, आपकी महिमा मन को पवित्र करने वाली है, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
जय सद्गुरु ईश्वर प्रापक हे ।भवरोग विकार विनाशक हे ॥ मन जेन रहे तव श्रीचरणे ।गुरुदेव दया करो दीनजने ॥८॥
उन गुरु की जय हो जो ईश्वर की ओर ले जाते हैं, जो इस संसार रूपी भवसागर की भयानक बीमारियों और विकार का विनाश करने वाले हैं, मेरा मन सदैव आपके श्री चरणों में लगा रहे, हे गुरुदेव मुझ दीन पर दया करो।
गुरु वंदना भवसागर तारण कारण हे -bhav sagar taran karan he lyrics
भारतीय संस्कृति में नागों का महत्वपूर्ण स्थान है। नाग भारतीय मिथोलॉजी, धार्मिकता, और कई परंपरागत कथाओं में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।नाग भारतीय धार्मिकता में देवता के रूप में माने जाते हैं। विशेष रूप से हिन्दू धर्म में नाग देवता सर्प देवता के रूप में पूजे जाते हैं। नाग पूजा का अभिषेक, आराधना, और उपासना भारत के विभिन्न हिस्सों में होती है।भारत में नाग देवता के अनेक मंदिर(Famous Nag Devta Temples) हैं।
नागों के भारतीय संस्कृति में महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि नागों के लिए नाग पंचमी नामक पर्व मनाया जाता है। इस पर्व में नागों की पूजा और आराधना की जाती है।भारत में अनेक नाग मंदिर है जिनमें से नागचंद्रेश्वर उज्जैन, नागकूप काशी , मन्नारशाला केरला आदि प्रमुख हैं। इस लेख के माध्यम से हम भारत के प्रमुख नाग मंदिरों (Famous Nag Devta Temples) की जानकारी देंगे।
Famous Nag Devta Temples Of India-भारत के प्रमुख नाग देवतामंदिर
Naag Koop Nag Devta Temple-नागकूप
नागकूप कारकोटक नागी तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है।यह काशी के जैतपुरा में स्थित है। इसकी की गहराई कितनी है यह कोई नहीं जानता। स्कंद पुराण के अनुसार यह वह स्थल है जहां से पाताल लोक जाने का रास्ता है। माना जाता है इस कूप के अंदर सात कूप हैं। नागपंचमी के पर्व पर यहां काल सर्पदोष की शांति के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगती है।
नागकूप में काशी में 100 फीट की गहराई में एक ऐसा शिवलिंग है, जिसके साल में सिर्फ एक बार नागपंचमी से 7 दिन पहले दिन दर्शन होते हैं। अगले दिन फिर यहां पूरा पानी भर जाता है। ये शिवलिंग शेषनाग के अवतार महर्षि पतंजलि द्वारा स्थापित नागकुआं में मौजूद है। इसमें पानी आने का रहस्य आज भी कोई नहीं समझ पाया है। कूप निर्माण को लेकर बताया जाता है, इसका जीर्णोद्धार संवत 1 में किसी राजा ने करवाया था। इस हिसाब से इसका समयकाल लगभग 2074 साल पुराना है।
मान्यता के अनुसार महर्षि पतंजलि ने अपने तप के लिए इस कूप का निर्माण करवाया था। इसकी सतह में उनके द्वारा स्थापित एक विशाल शिवलिंग है, जो जमीन तल से 100 फीट नीचे है। यहाँ पूजा और दर्शन साल में एक बार नागपंचमी के 7 दिन पहले कूप की सफाई के दौरान हो पाते हैं। इसके बाद साल भर यह शिवलिंग पानी डूबा रहता है। यहीं पर उन्होंने अपने गुरु पाणिनि के साथ कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की, जिसमें महाभाष्य, चरक संहिता, पतंजलि योग दर्शन प्रमुख हैं।
Nagchanderswar Nag Devta Temple–नागचंद्रेश्वर मंदिर उज्जैन
उज्जैन में स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर का अपना एक अलग महत्व है। यह मंदिर महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल में स्थिति है। ये मंदिर सालभर में सिर्फ नागपंचमी के दिन ही पूरे 24 घंटे के लिए खोला जाता है। माना जाता है कि यहां पर नागराज तक्षक स्वयं विराजित है। इस मंदिर में दर्शन करने मात्र से हर तरह के कालसर्प दोष से छुटकारा मिल जाता है।
Nagchanderswar Temple
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नागों के राजा तक्षक ने शिवजी को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दे दिया। माना जाता है कि तक्षक राजा ने प्रभु के सानिध्य में वास करना शुरू कर दिया, लेकिन महाकाल की वन में वास करने से पूर्व यहीं मंशा थी कि उनके एकांत में किसी भी तरह का विघ्य ना हो। इसी परंपरा के कारण वर्ष में सिर्फ एक बार इस मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और शेष समय कपाट बंद रहते है।
Nag Vasuki Temple Prayag-नाग वासुकि मंदिर
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में दारागंज में नागवासुकि मंदिर स्थित है। नाग वासुकि भगवान शिव के गले में सुभोभित रहते हैं। नाग पंचमी के दिन एक बड़ा मेला लगता है।ऐसा माना जाता है कि इस दौरान मंदिर में विग्रह के दर्शन मात्र से पाप का नाश होता है. वहीं, कालसर्प दोष से भी मुक्ति मिलती है.
Takshkeshwarnath Nag Devta TemplePrayag– तक्षकेश्वर नाथ मंदिर
यह मंदिर भी प्रयागराज में यमुना किनारे स्थित है। यह बहुत ही प्राचीन नाग मंदिर है। इस मंदिर के बारे में ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में भगवान शिव और नाग देवता का जो भी दर्शन करता उसे और उसके कुल को कभी भी सर्प भय और कालसर्प दोष नहीं रहता है।
Mannarasala Sree Nagaraja Kshetram-मन्नारशाला
मन्नारसला श्री नागराज क्षेत्रम दक्षिण-पश्चिम केरल में स्थित एक प्राचीन तीर्थस्थल है। दुनिया में नाग पूजा के सभी स्थानों में से, मन्नारसला से अधिक सौम्य, विस्मयकारी और पौराणिक कोई नहीं है, जैसा कि केरल के निर्माता भगवान परशुराम ने आशीर्वाद दिया और कल्पना की थी। यह 30 हजार नागों वाला मंदिर है। जहां पर नागों की मूर्तियां है। यह मंदिर 16 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस मंदिर में नागराज तथा उनकी जीवन संगिनी नागयक्षी देवी की प्रतिमा स्थित है।
Sem Mukhem Nagraja Nag Devta Temple-सेम-मुखेम नागराजा मंदिर
सेम-मुखेम नागराजा मंदिर उत्तराखंड के टिहरी में स्थित है । मान्यता है कि द्वारिका नगरी डूबने के बाद भगवान श्रीकृष्ण यहां नागराज के रूप प्रकट हुए थे। मन्दिर के गर्भगृह में नागराजा की स्वयं भू-शिला है।अधिक जानकारी यह लेख पढ़ें -Sem Mukhem Nagraja /सेम मुखेम मंदिर की पूरी जानकारी
Bhujang Nag Temple, Gujarat-भुजंग नाग मंदिर, गुजरात
यह भव्य मंदिर गुजरात के कच्छ जिले में है। किंवदंतियों के अनुसार, भुज के बाहरी इलाके में स्थित भुजिया किला अंतिम नागा कबीले, भुजंगा को समर्पित है। बाद में, स्थानीय लोगों ने उन्हें सम्मान देने के लिए भुजिया पहाड़ियों पर एक मंदिर बनाया। नागा पंचमी के दौरान भुजंग नागा मंदिर के पास मेला लगता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि भुजंग नागा काठियावाड़ के थान से आए थे और उन्होंने कच्छ को दैत्यों और राक्षसों के दमनकारी शासन से मुक्त कराया था।
Nagaraja Temple, Tamil Nadu-नागराजा मंदिर, तमिलनाडु
नागों और देवताओं की कई उत्कृष्ट नक्काशीदार मूर्तियों वाला यह मंदिर तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के नागरकोइल में है। इसके दो मुख्य देवता हैं – भगवान कृष्ण और नागराज या नागों के राजा भगवान वासुकी। नागराज की मूर्ति के पाँच सिर या फण हैं। किंवदंती है कि एक बार जब एक लड़की घास काट रही थी तो गलती से पांच सिर वाले सांप से टकरा गई। लड़की ने घटना के बारे में गांव वालों को बताया और उन्होंने उस स्थान पर एक मंदिर बना दिया।
यह मंदिर 1000-2000 साल पुराना है। भगवान नागराज स्वयंभूमूर्ति हैं और जमीन के स्तर से नीचे हैं। उसके पांच सिर हैं और वह जहां बैठता है वह स्थान गीला और केसरिया रंग का है। ऐसा उस खून के कारण है जो कथित तौर पर मूर्ति के सिर से निकला था। यहां का प्रसाद अनोखा है. यह “मन्नू” या रेत है। भक्त दूध और हल्दी चढ़ाते हैं। ब्रह्मोत्सवम, अवनि आश्लेषा, कृष्ण जयंती, नवरात्रि और तिरुकार्तिकई इस मंदिर के प्रमुख त्योहार हैं।
Kukke Subramanya Temple, Karnataka-कुक्के सुब्रमण्यम मंदिर, कर्नाटक
इस मंदिर में लोग भगवान सुब्रमण्यम, भगवान वासुकी और भगवान शेष की पूजा करते हैं। इसके चारों ओर सुरम्य कुमार पर्वत शिखर है, और मंदिर कुमारधारा नदी के तट पर स्थित है। कहानी यह है कि भगवान वासुकी और अन्य सांपों ने सुब्रमण्यम की गुफाओं में आश्रय लिया था। जिन लोगों को कालसर्प दोष होता है वे इससे छुटकारा पाने के लिए इस मंदिर में पूजा करते हैं।
Sheshnag Temple, Jammu & Kashmir-शेषनाग मंदिर, जम्मू और कश्मीर
यह मंदिर मानसर झील के पूर्वी तट पर स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, शेषनाग ने पहलगाम के पास एक झील बनाई थी। स्थानीय लोगों का मानना है कि शेषनाग आज भी यहां रहते हैं। उन्होंने इसके तट पर उनके लिए एक मंदिर भी बनवाया। अमरनाथ गुफा जाने वाले तीर्थयात्री मंदिर में जाकर शेषनाग की पूजा करते हैं।
FAQ
काल सर्प दोष क्या होता है
किसी जातक जन्म कुंडली में, राहु और केतु को हमेशा एक दूसरे से सात भाव की दूरी पर होते है। जब सभी ग्रह इन सात घरों के भीतर आते हैं और बाकी पांच घर खाली रहते हैं, तो यह काल सर्प दोश बनाता है। यह वैदिक ज्योतिष में अशुभ माना जाता है। अपनी जन्म पत्रिका का विश्लेषण करते समय, यह देखना आवश्यक है कि क्या कोई ग्रह वास्तव में राहु से केतु तक के सात घरों के भीतर आता है। यह दोश विवाह, कैरियर, वित्त, स्वास्थ्य और बच्चों सहित सभी पहलुओं में जीवन में बहुत संघर्ष का कारण बनता है। राहु और केतु की स्थिति के आधार पर, 12 प्रकार के काल सरप दोशा को जाना जाता है। वे निम्न हैं: अनंत कालसर्प दोष, कुलिक कालसर्प दोष, वसुकी कालसर्प दोष, संखापल कालसर्प दोष, पद्म कालसर्प दोष, महा पद्म कालसर्प दोष, तक्षक कालसर्प दोष, कर्कोटक कालसर्प दोष, शंकचुड कालसर्प दोष, घातक कालसर्प दोष, विषधर कालसर्प दोष, शेषनाग कालसर्प दोष
Nag Panchami हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहारों में से है। हिन्दू पंचांग के अनुसार सावन माह की कृष्ण पक्ष के पंचमी को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता या सर्प की पूजा की जाती है और उन्हें दूध से स्नान कराया जाता है।
श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पंचमी कहते हैं। इस दिन नागों की पूजा की जाती है। गरुण पुराण में ऐसा कहा गया है कि नाग पंचमी(Nag Panchami) के दिन घर के दोनों बगल में नाग देवता की मूर्ति खींचकर अनन्तर प्रमुख महानागों का पूजन किया जाना चाहिए।
पंचमी नागों की तिथि है ,ज्योतिष के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग हैं। इसलिए शेष आदि सर्पराजों का पूजन पंचमी को होना चाहिए। सुंगंधित पुष्प तथा दूध सर्पों को अति प्रिय हैं। गाँवो में इस दिन को नागचैयां भी कहते हैं। इस दिन ग्रामीण लड़कियां किसी जलाशय में गुड़ियों का विसर्जन करती हैं। ग्रामीण बच्चे तैरती हुई इन निर्जीव गुड़ियों को पीटते हैं। तत्पश्चात बहन उन्हें रुपयों की भेंट तथा आशीर्वाद देती हैं।
Nag Panchami Tithi Aur Puja Muhurt-नाग पंचमी तिथि और पूजा का मुहूर्त
नाग पञ्चमी सोमवार, 29जुलाई, 2023 नाग पञ्चमी पूजा मूहूर्त – 05:29 ए एम से 08:11 ए एम अवधि – 02 घण्टे 42 मिनट्स
पञ्चमी तिथि प्रारम्भ – 28 जुलाई, 2023 को 11:24 पी एम पञ्चमी तिथि समाप्त – 29 जुलाई , 2023 को 12:46 पी एम
Nag Panchami Katha-नाग पंचमी कथा
प्राचीन काल की दन्त कथाओं से ज्ञात होता है कि किसी ब्राह्मण की सात पुत्रवधुयें थीं। सावन मास लगते ही छः बहुएं तो भाई के साथ मायके चली गईं परन्तु सातवीं बहु का कोई भाई ही न था तो बुलाने कौन आता। बेचारी ने अति दुःखी होकर पृथ्वी को धारण करने वाले शेष नाग को भाई रूप में याद किया।
करुणा युक्त दीन वाणी सुनकर शेष जी वृद्ध ब्राह्मण के रूप में आये और उसे लिवाकर चल दिये। थोड़ी दूर रास्ता तय करने पर उन्होंने अपना असली रूप धारण कर लिया। तब फन पर बैठा कर नागलोक ले गये। वहाँ वह निश्चिन्त होकर रहने लगी। पाताल -लोक में जब वह निवास कर रही थी उसी समय शेष जी की कुल परम्परा में नागों के बहुत से बच्चों ने जन्म लिया।
उन नाग बच्चों को सर्वत विचरण करते देख शेष -नागरानी ने उस वधू को पीतल का एक दीपक दिया तथा बताया कि इसके प्रकाश से तुम अँधेरे में भी सब कुछ देख सकोगी। एक दिन अकस्मात उसके हाथ से दीपक नीचे टहलते हुए नाग बच्चों पर गिर गया। परिणाम स्वरूप उन सबकी थोड़ी पूंछ कट गई।
यह घटना घटित होते ही कुछ समय बाद वह ससुराल भेज दी गई। जब अगला सावन आया तो वह वधू दीवार पर नागदेवता को उरेहकर उनकी विधिवत पूजा तथा मंगल कामना करने लगी। इधर क्रोधित नाग बालक माताओं से अपनी पूंछ काटने का आदिकारण इस वधू को मानकर बदला लेने के लिए आये थे। लेकिन अपनी ही पूजा में श्रद्धा वनत उसे देखकर वे सब प्रसन्न हुए और उनका क्रोध समाप्त हो गया।
बहन स्वरूपा उस वधू के हाथ से प्रसाद के रूप में उन लोगों ने दूध तथा चावल भी खाया। नागों ने उसे सर्पकुल से निर्भय होने का वरदान दिया तथा उपहार में मड़ियों की माला दी।
उन्होंने यह भी बताया की श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को हमें भाई के रूप में जो भी पूजेगा हम उसकी रक्षा करते रहेंगे।
Nagpanchami Ka Mahatva-नाग पंचमी का महत्व
हिन्दू धर्म में नागों को विशेष स्थान प्राप्त है। इनका इतना अधिक महत्त्व है कि महादेव स्वयं वासुकि नामक नाग को अपने गले में धारण करते हैं तथा जगत के पालनहार भगवान विष्णु शेष शैय्या पर विराजमान रहते हैं। नाग शब्द संस्कृत और पालि का शब्द है जो भारतीय धर्मों में महान सर्प को दर्शाता है । नाग दिव्य या अर्ध-दिव्य देवता हैं।हिन्दू मान्यताओं में अष्टनागों का वर्णन मिलता है जिनका बहुत महत्व है।
Ashtnaag-अष्टनाग
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार अष्टनाग हैं – अनंत (शेष), 2. वासुकी, 3. तक्षक, 4. कर्कोटक, 5. पद्म, 6. महापद्म, 7. शंख और 8. कुलिक।
शेषनाग -कहा जाता है कि इनके के फन पर धरती टिकी हुई है यह पाताल लोक में ही रहते हैं। चित्रों में अक्सर हिंदू देवता भगवान विष्णु को शेषनाग पर लेटे हुए चित्रित किया गया है।मान्यता है कि शेषनाग के हजार मस्तक हैं। इनका कही अंत नहीं है इसीलिए इन्हें ‘अनंत’ भी कहा गया है।
वासुकि -शेषनाग के भाई वासुकि को भगवान शिव के सेवक थे। नागों के दूसरे राजा वासुकि का इलाका कैलाश पर्वत के आसपास का क्षेत्र था। पुराणों अनुसार वासुकि नाग अत्यंत ही विशाल और लंबे शरीर वाले माने जाते हैं। समुद्र मंथन के दौरान देव और दानवों ने मंदराचल पर्वत को मथनी तथा वासुकी को ही नेती (रस्सी) बनाया था। त्रिपुरदाह के समय वह शिव के धनुष की डोर बने थे।
तक्षक ने शमीक मुनि के शाप के आधार पर राजा परीक्षित को डंसा था। उसके बाद परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने नाग जाति का नाश करने के लिए नाग यज्ञ करवाया था। माना जाता है कि तक्षक का राज तक्षशिला में था।
कर्कोटक– कर्कोटक और ऐरावत नाग कुल का इलाका पंजाब की इरावती नदी के आसपास का माना जाता है। कर्कोटक शिव के एक गण और नागों के राजा थे। नारद ऋषि के शाप से वे एक अग्नि में पड़े थे, लेकिन नल ने उन्हें बचाया और कर्कोटक ने नल को डस लिया, जिससे राजा नल का रंग काला पड़ गया। लेकिन यह भी एक शाप के चलते ही हुआ तब राजा नल को कर्कोटक वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए। शिवजी की स्तुति के कारण कर्कोटक जनमेजय के नाग यज्ञ से बच निकले थे और उज्जैन में उन्होंने शिव की घोर तपस्या की थी। कर्कोटेश्वर का एक प्राचीन उपेक्षित मंदिर आज भी चौबीस खम्भा देवी के पास कोट मोहल्ले में है। वर्तमान में कर्कोटेश्वर मंदिर हरसिद्धि के प्रांगण में है।
पद्म – पद्म नागों का गोमती नदी के पास के नेमिश नामक क्षेत्र पर शासन था। बाद में ये मणिपुर में बस गए थे। असम के नागावंशी इन्हीं के वंश से है।
महापद्म– विष्णुपुराण में सर्प के विभिन्न कुलों में महापद्म का नाम भी आया है। पद्म और महापद्म नाग कुल में विशेष प्रीति थी।
शंख– नागों के 8 मुख्य कुलों में से एक है। शंख नागों पर धारियां होती हैं। यह जाति अन्य नाग जातियों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान मानी जाती थी।
कुलिक– कुलिक नाग जाति नागों में ब्राह्मण कुल की मानी जाती है जिसमें अनंत भी आते हैं। ये अन्य नागों की भांति कश्यप ऋषि के पुत्र थे लेकिन इनका संबंध सीधे ब्रह्माजी से भी माना जाता है।
नाग पंचमी के पावन पर्व पर वाराणसी (काशी) में नाग कुआँ मंदिर, नागचंद्रेश्वर मंदिर उज्जैन, नाग वासुकि मंदिर, तक्षेश्वर मंदिर आदि मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है और मेला लगता है। इनमें से कुछ मंदिरों में दर्शन मात्र से कालसर्प दोष की शांति हो जाती है।
नागचंद्रेश्वर मंदिर उज्जैन
आइए कुछ प्रमुख नाग मंदिरो के विषय में जानते हैं।भारत के प्रमुख नाग मंदिरो के विषय में जानने के लिए निम्न लेख पढ़ें।
सर्वे नागाः प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथ्वीतले. ये च हेलिमरीचिस्था येऽन्तरे दिवि संस्थिताः॥ ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिनः. ये च वापीतडगेषु तेषु सर्वेषु वै नमः॥
अर्थ – इस संसार में, आकाश, स्वर्ग, झीलें, कुएँ, तालाब तथा सूर्य-किरणों में निवास करने वाले सर्प, हमें आशीर्वाद दें तथा हम सभी आपको बारम्बार नमन करते हैं ।
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्. शङ्ख पालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा॥ एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्. सायङ्काले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः. तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्॥
अर्थ – नौ नाग देवताओं के नाम अनन्त, वासुकी, शेष, पद्मनाभ, कम्बल, शङ्खपाल, धृतराष्ट्र, तक्षक तथा कालिया हैं. यदि प्रतिदिन प्रातःकाल नियमित रूप से इनका जप किया जाता है, तो नाग देवता आपको समस्त पापों से सुरक्षित रखेंगे तथा आपको जीवन में विजयी बनायेंगे ।
Shri Krishnashtakam भगवान श्री कृष्ण के गुणगान में लिखे गए आठ श्लोकों का संग्रह है। इसका पाठ भगवान श्री कृष्ण की कृपा पाने और जन्माष्टमी जैसे शुभ अवसरों पर किया सकता है। जो लोग शनि ग्रह की पीड़ा से ग्रसित हो या जिनका चन्द्रमा कमजोर हो उन्हें भी इस सुन्दर स्तोत्र द्वारा भगवान श्री कृष्ण का पूजन करना चाहिए।
मैं नटखट भगवान कृष्ण की वंदना करता हूं, जो व्रज का अमूल्य गहना है, जो सभी पापों का विनाश कर देते हैं, जो सदैवअपने भक्तों को को प्रसन्न करते है, बाबा नंद के घर का आनंद, जिनके सिर पर मोर पंख सुशोभित है, भगवान कृष्ण की मधुर-मीठी आवाज़ है, उनके हाथ में बांसुरी और जो प्रेम के सागर है।
मैं उन भगवान भगवान कृष्ण की वंदना करता हूं, जो मनुष्य के अन्दर अभिमान और काम से छुटकारा दिलाते हैं, ऐसे प्रभि के पास सुंदर और बड़ी आंखें हैं, जो गोपालों (चरवाहों) के दुखों को दूर करते हैं। मैं उन भगवान कृष्ण को प्रणाम करता हूं जिन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपने हाथ की तर्जनी ऊँगली से उठाया, जिनकी मुस्कान और एक झलक अत्यंत आकर्षक है, जिन्होंने इंद्र के घमंड को नष्ट कर दिया था(गोवर्धन पर्वत को उठाकर गोकुल वासियों की इन्द्र से रक्षा की थी। )|
कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलं, व्रजाङ्गनैकवल्लभं नमामि कृष्ण दुर्लभम् । यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया, युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम् ॥ ३ ॥
मैं उन भगवान कृष्ण को नमन करता हूं, जो कदंब के फूलों से बने कुण्डल पहनते हैं, जिनके सुंदर लाल गाल हैं, जो ब्रज के गोपियों के एकमात्र प्राण से भी प्रिय सखा हैं, और जिन्हें भक्ति के अलावा और किसी भी तरह से प्राप्त करना मुश्किल है। मैं भगवान भगवान भगवान कृष्ण को नमन करता हूं, जो ग्वालों, नन्द बाबा और माता यशोदा के प्रिय हैं, जो अपने भक्तों को खुशी के अलावा कुछ नहीं देते है और जो ग्वालों के भगवान हैं।
सदा ही पवित्र चरण कमल वाले मेरे(मदीय) मानस (हृदय में ) में स्थापित करने वाले। मैं श्री कृष्ण जिनके चरण कमल अत्यंत ही शुभ हैं उन्हें मेरे हृदय में स्थापित करने वाले, कृष्ण को नमन करता हूँ। जिनके घुंघराले बाल हैं,जिनके बालों सुन्दर घुंघराले हैं। मैंने ऐसे नन्द के शिशु को नमन करता हूँ। जो समस्त दोष, अवगुण का नाश करने वाले हैं और समस्त जन के पोषण करने वाले हैं, जग पालक हैं मैं उन्हें नमन करता हूँ। जो समस्त गोप जन के मानस (चित/हृदय) में, नन्द के हृदय में आनंदस्वरूप हैं, मैं ऐसे श्री कृष्ण को नमन करता हूँ।
भुवोभरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकं, यशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम् । दृगन्तकान्तभङ्गिनं सदासदालसङ्गिनं, दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसंभवम् ॥ ५ ॥
मैं भगवान कृष्ण को नमन करता हूं, जो पृथ्वी पर होने वाले अधर्म कार्य को रोकते है और धरम की रक्षा करते है, जो हमें दुखों के सागर को पार करने में सहायक है, जो मईया यशोदा के लाल है, और इनकी मनमोहक अदाएं और मुस्कान सभी के दिलों को भा जाती है। मैं नन्द के के बेटे को नमन करता हूं, जिसके पास बेहद सुन्दर और आकर्षक आंखें हैं, जो हमेशा संत और भक्तजनों के साथ है, और जिसके दिन-प्रतिदिन नए रूप दिखाई देते हैं।
समस्त गुणों से युक्त सुख प्रदान करने वाले, सदैव ही कृपा करने, परम कृपा करने वाले, देवताओं के शत्रुओं को नष्ट करने वाले, गोपनन्दन को नमन है। जो नवीन गोप में चतुर हैं, जो नित्य नवीन क्रीड़ा करते हैं,जो काले मेघ के समान सुन्दर, जो चमकती बिजली के समान पीतांबर धारण करने वाले श्री कृष्ण को नमन करता हूँ।
भगवान कृष्ण सभी ग्वालों को प्रसन्न करते हैं और हृदय रूपी अम्बुज को प्रसन्न करने वाले, हृदय रूपी कुञ्ज में खेलने वाले, आनंदित, सूर्य से प्रकाशित श्री कृष्ण को नमन। मैं ऐसे भगवान को नमन करता हूं, जो पूरी तरह से भक्त की इच्छाओं को पूरा करते हैं, जिनकी सुंदर झलक तीर के समान दिल में उतरती है और जो बांसुरी पर मधुर धुन बजाते हैं।
चतुर गोप गोपिकाओं के मन रूपी शैया पर वास करने वाले, बृज के भकजनों के विरह अग्नि का पान करने वाले भगवान श्री कृष्ण को नमन है। अपनी किशोर अवस्था से आभा को बांटने वाले, जिनके नेत्रों में काजल शोभित है। भगवान् श्री कृष्ण जो गजराज को मोक्ष प्रदान करने वाले हैं(गजेंद्र की करूण पुकार को सुनकर भगवान विष्णु ने उन्हें मगरमच्छ की पकड़ से मुक्त कराया था ), जो श्री अर्थात माता लक्ष्मी के साथ विहार करने वाले हैं, ऐसे श्री कृष्ण को नमन।
मैं जहाँ पर जैसी भी परिस्थिति में रहूं, मैं वहां पर श्री कृष्ण की सत्कथा का गायन करता रहूं, हे ईश्वर ऐसी कृपा बनी रहे। हे श्री कृष्ण मुझ पर आप ऐसी कृपा करो की मैं हर हालात में आपके यश का गान करता रहूं। जो कोई भी इस अष्टक का गान करता है, वाचन करता है, वह प्रत्येक जन्म में श्री कृष्ण की करुणा ,आशीर्वाद और भक्ति को प्राप्त करता है।
Ekadashi Vrat Ka Khana हिंदू पञ्चाङ्ग की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहते हैं। यह तिथि मास में दो बार आती है – पूर्णिमा में उपरान्त कृष्ण पक्ष की एकादशी और अमावस्या के उपरान्त शुक्ल पक्ष की एकादशी इन दोनों प्रकार की एकादशियोँ का हिन्दू धर्म में बहुत महत्त्व है। एकादशी के दिन व्रत रखना बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन अन्न का निषेध होता है विशेषकर चावल का। जो लोग व्रत नहीं भी रखते हैं उन्हें भी इस दिन चावल नहीं खाना चाहिए।
इस लेख के माध्यम से हम एकादशी व्रत में किए जाने वाले भोजन के विषय में जानकारी देने का प्रयास कर रहे हैं।
भक्त अपनी इच्छा शक्ति और शारीरिक शक्ति के अनुसार संकलप के दौरान एकादशी उपवास के प्रकार का फैसला कर सकते हैं। धार्मिक ग्रंथों में चार प्रकार के एकादशी व्रत का उल्लेख किया गया है।
1. निर्जला व्रत
इस प्रकार के व्रत में जल भी ग्रहण नहीं किया जाता है। अधिकांश भक्त निर्जला एकादशी के दौरान इस उपवास को करते हैं। हालांकि भक्त सभी एकादशी उपवास प्रकार कर सकते हैं। पर क्योंकि निर्जला व्रत अत्यंत कठिन होता है। अतः इस व्रत को सामान्य गृहस्थ लोगों को नहीं रखना चाहिए। जिन लोगों को किसी भी प्रकार का रोग है उन्हें निर्जला व्रत नहीं रखना चाहिए।
2. क्षीरभोजी
क्षीरभोजी अर्थात् सिर्फ क्षीर पर एकादशीव्रत। क्षीर दूध और पौधों के दूधिया रस को दर्शाता है। लेकिन एकादशी संदर्भ में यह सभी उत्पादों को दूध से बने होना चाहिए।इस प्रकार के व्रत में दूध, दूध की बनी मिठाई, दही, छाछ आदि का सेवन करना चाहिए। यदि देशी गाय के दूध का उपयोग किया जाए तो यह सर्वश्रेष्ठ होता है।
3.फलाहार
फलाहार यानी एकादशी केवल फलों पर उपवास करना। आम को आम, अंगूर, केला, बादाम और पिस्ता आदि जैसे फलों के केवल उच्च वर्ग का उपभोग करना चाहिए और पत्तेदार सब्जियां नहीं खाना चाहिए।
4. नक्तभोजी
नक्त भोजन का अर्थ होता है पूरे दिन कुछ न खाकर सूर्यास्त के बाद तीन घड़ियों (संध्याकाल) को छोड़कर रात्रि में एक बार भोजन करना। इस भोजन में बीन्स, गेहूं, चावल और दालों सहित किसी भी तरह के अनाज और अनाज नहीं होने चाहिए, जो एकादशी व्रत के दौरान निषिद्ध हैं।
एकादशी व्रत के दौरान नक्तभोजी के लिए आहार में साबूदाना, सिंघाड़ा , शकरकंद , मखाना, आलू , रामदाना और मूंगफली शामिल हैं।
कई लोग कुट्टू अट्टा और समक (बाजरा चावल) भी लेते हैं। हालांकि एकादशी भोजन के रूप में दोनों वस्तुओं की वैधता बहस का विषय है क्योंकि उन्हें अर्ध-दाने या छद्म अनाज माना जाता है। अतः उपवास के दौरान इन वस्तुओं से बचना बेहतर है।
हम कुछ ऐसे खाद्य वस्तुओं के विषय में बता रहें हैं जिन्हें व्रत में खाया जा सकता है तथा ये पौष्टिक भी होती हैं।
Sabudana-साबूदाना
Ekadashi Vrat Ka Khana-SabudanaVadaSabudana KheerSabudana Papad
साबूदाना एक खाद्य पदार्थ है। यह छोटे-छोटे मोती की तरह सफ़ेद और गोल होते हैं।भारत मे यह कसावा/टेपियोका की जडों से व अन्य अफ्रीकी देशों मे सैगो पाम नामक पेड़ के तने के गूदे से बनता है। भारत में जब लोग में साबूदाने के विभिन्न प्रकार के व्यंजन जैसे साबूदाना खिचड़ी, साबूदाना पापड़, साबूदाने की खीर, साबूदाना वड़ा आदि बनाकर खाते हैं। साबूदाने में मुख्यतः कार्बोहिड्रेट्स और कैल्सियम होता है। यह आसानी से पच जाता है और जल्दी ऊर्जा देता है।
Makhana-मखाना
Makhana MixMakhana Kheer
मखाना के बीज का उपयोग उत्तर भारत में विशेष रूप से होता है और इसे विभिन्न स्वादिष्ट व्यंजनों जैसे मखाने की खीर, रोस्टेड मखाना आदि में उपयोग किया जाता है। मखाना गुणकारी होता है और कई पोषक तत्वों से भरपूर होता है। यह उच्च प्रोटीन, लो वसा, कार्बोहाइड्रेट्स, फाइबर, विटामिन, और खनिजों का भंडार होता है। मखाने का उपयोग व्रत के भोजन में होता है, क्योंकि यह व्रती भोजन के लिए स्वस्थ और पौष्टिक विकल्प प्रदान करता है।
Rajgira-रामदाना/राजगिरा
Ekadashi Vrat Ka Khana-Rajgira Laddo
रामदाना (Ramdana) को राजगिरा भी कहा जाता है। व्रत में राजगिरी के आटे (rajgiri ka Atta) का परांठा या हलवा बनाकर खाया जाता है। व्रत में रामदाने का लड्डू (rajgira ladoo) और खीर भी बनाकर खाई जाती है। रामदाना पौष्टिकारक होने के कारण इसके अनगिनत फायदे हैं, इसलिए उपवास के समय ज्यादातर इसका सेवन किया जाता है। इसके सेवन से शरीर में प्रोटीन की कमी पूरी होती है एवं शरीर में ऊर्जा बनी रहती है।
Singhara-सिंघाड़ा
singharasinghara atta halwasinghara atta puri
सिंगाड़ा (Singhara) एक ऐसा फल है जो त्रिकोण आकार का और दो सिंग वाला होता है। लेकिन इसके अनोखे आकार की तरह फायदे भी अनगिनत होते हैं। सिंगाड़ा (Water caltrop, Water Chestnut) मूल रुप से सर्दी के मौसम में पाया जाता है। इसको छील कर इसके गूदे को सुखाकर और फिर पीसकर जो आटा बनाया जाता है उस आटे से बनी खाद्य वस्तुओं जैसे- सिंघाड़े की पूरी , सिंघाड़े का हलवा, सिंघाड़े की कतली आदि का भारत में लोग व्रत उपवास में सेवन करते हैं क्योंकि इसे एक अनाज नहीं वरण एक फल माना जाता है।
Shakarkand-शकरकंद
शकरकंद(Sweet Potato) खाना सेहत के लिए फायदेमंद है और इसे व्रत में खाया भी जा सकता है। शकरकंद पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसकी भूनकर खाया जा सकता है। इसके अलावा इसे भूनकर इसकी खीर बनाकर खाना एक अच्छा विकल्प हो सकता है। सर्दियों में शकरकंद खाने से सर्दियों से भी बचाव होता है।
Dry Fruits-सूखे मेवे
Cashew-काजूAlmonds-बादामWalnut-अखरोट
व्रत के दौरान दिन में एक या दो बार सूखे मेवे का सेवन करें। इसमें काजू, बादाम, मूंगफली, पिस्ता, अखरोट, किशमिश, खजूर, छुहारा आदि शामिल करें। इससे पोषक तत्व भी मिलेंगे और ऊर्जा भी बनी रहेगी। सूखे मेवे के लड्डू या पाग बना कर भी खा सकते हैं।
एकादशी व्रत में क्या न खाएं
एकादशी व्रत रखने वाले लोगों को दशमी के दिन से ही सात्विक भोजन करना चाहिए। भोजन में बैंगन, मसूर की दाल, गाजर, मूली, लहसुन, प्याज, चावल आदि नहीं खाना चाहिए। व्रत के दिन अपने संकल्प के अनुसार व्रत का भोजन करना चाहिए तथा पारण के दिन भी सात्विक भोजन ही करना चाहिए।
हिन्दू धर्म में सूर्य पूजा(Surya Puja) का अत्यधिक महत्व है। सूर्य का प्रकाश ही इस सृष्टि में ऊर्जा का मुख्य स्तोत्र है। सूर्य के प्रकाश द्वारा ही पृथ्वी पर उपस्थित समस्त जीव-जंतुओं और वनस्पतियों का पोषण होता है। पृथ्वी पर जीवन के लिए सूर्य का प्रकाश अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके बिना पृथ्वी पर जीवन संभव ही नहीं है।
Surya Puja ka Pauranik Mahatava-सूर्य भगवान की पूजा का महत्व
आदित्य ह्रदय स्त्रोत(aditya hridaya stotra) का पाठ करके भगवान श्री राम ने रावण का वध किया और विजय प्राप्त की।
ऐसी कथा प्रसिद्ध है कि भगवान श्री राम रावण की अतुल शक्ति व पराक्रम को सुनकर हतप्रभ रह गये। जब श्रीराम ने यह सुना की महाअसुर रावण ने तो अमृत चख रखा है। उसकी मृत्यु किसी भी अस्त्र-शस्त्र देव दानव द्वारा नहीं हो सकती तो भगवान श्री राम कुछ क्षणों के लिए अपने देवत्व को भूलकर निरुत्साहित होकर चिंतित हो उठे की ऐसे दुर्गम्य, महाबलशाली राक्षस राज रावण का वध कैसे कर पाएंगे और किस प्रकार से सीता जी को उनके चंगुल से छुड़ा पाएंगे।
भगवान श्री राम के उदास होने पर सारी वानर सेना हतोत्साहित व निराश हो गई। ऐसे में दक्षिण प्रदेश के एक पठार पर अचानक अगस्त्य ऋषि प्रकट हुए और भगवान श्रीराम को आदित्य ह्रदय स्त्रोत पढ़ने को कहा इस स्त्रोत का 3 बार पाठ करते ही भगवान श्रीराम को सूर्य देवता की कृपा से अदम्य उत्साह, आत्मविश्वास एवं नवीन शक्ति का संचार हुआ। वह विशेष इस स्फूर्ति से शत्रु नाश हेतु उद्यत हो उठे। बाल्मीकि रामायण युद्ध कांड में इस संपूर्ण प्रसंग का वर्णन मिलता है।
भगवान सूर्य के आशीर्वाद से ही कुंती को कर्ण पुत्र के रूप में मिला था तथा वानर राज ऋक्षराज को सुग्रीव पुत्र रूप में मिले।
भगवान सूर्य की उपासना करते सत्रजीत ने स्यमन्तक मणि प्राप्त की थी।
धर्मराज ने भगवान सूर्य पूजा करके अक्षय पात्र को प्राप्त किया था जिसका प्रयोग वह अपने अतिथियों को भोजन कराने के लिए करते थे।
स्कंद पुराण के अनुसार व्यक्ति को सुख और कल्याण के लिए भगवान सूर्य की उपासना करनी चाहिए।
साम्ब पुराण के अनुसार जाम्बवती के पुत्र साम्ब ने अपने कुष्ठ रोग को भगवान सूर्य की उपासना करके दूर किया था।
मयूर भट्ट ने भगवान सूर्य की उपासना करके अपने आप को कुष्ठ रोग से रोग मुक्त किया था। उन्होंने सूर्य शतकं की रचना की थी।
Surya Puja Ka Jyotishiya Mahatva-सूर्य पूजा का ज्योतिषीय महत्व
ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को राजा की पदवी प्राप्त है। सूर्य को प्रथम भाव का स्थिर कारक सूर्य है। कुंडली में अच्छा सूर्य अच्छे स्वास्थ्य का द्योतक होता है।
सूर्य आत्मा, शक्ति, बल, प्रभाव, गर्मी, अग्नि तत्व, धैर्य, राजा , कटुता, आक्रामकता, पिता, अभिरुचि, ज्ञान, हड्डी, प्रताप, पाचन शक्ति, उत्साह, वन प्रदेश, आंख, वन भ्रमण, पित्त, नेत्ररोग, शरीर, लकड़ी, मन की पवित्रता, शासन, रोगनाश, देश, सर के रोग, गंजापन, लाल उन, पर्वतीय प्रदेश, पत्थर, प्रदर्शन की भावना, नदी का किनारा, मूँग, लाल चन्दन, चिकित्सा विज्ञान, सोना, ताम्बा, शस्त्र प्रयोग, दवा, समुद्रपार की यात्रा, हृदय आदि का कारक है। अतः ज्योतिषीय रूप से अच्छे स्वास्थ्य , पिता के सुख, सरकार से लाभ, सरकारी नौकरी आदि के लिए जन्म कुंडली में सूर्य का मजबूत होना आवश्यक है।
Surya Puja Ka Sanskritik Mahatva-सूर्य पूजा का सांस्कृतिक महत्व
भारतीय संस्कृति में सूर्य अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। हमारे कई महत्वपूर्ण त्यौहार सूर्य के ऊपर आधारित हैं। जैसे मकर संक्रांति का पर्व सम्पूर्ण उत्तर भारत में अत्यंत हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन सूर्य देव उत्तरायण होते हैं। मकर संक्रांति को ही भारत के अन्य हिस्सों जैसे तमिलनाडु में पोंगल; कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में संक्रांति ,बिहार के कुछ जिलों में यह पर्व ‘तिला संक्रांत’ कहा जाता है। मकर संक्रान्ति पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायण भी कहते हैं। उत्तर प्रदेश में इसे खिचड़ी भी कहा जाता है।
बिहार में दीपावली के पश्चात कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को छठ पूजा होती है जोअत्यंत प्रसिद्ध है। छठ पूजा चार दिवसीय पर्व है जिसमें माताएं अपने पुत्र के लिए व्रत रखती हैं और सूर्य देव का पूजन करती हैं।
SAPTA SAPTIH – SURYA BHAGAVAN-सप्त सप्ति सूर्य भगवान
Surya Dev Ke Saat Ghode-सात घोड़े
भविष्य पुराण के अनुसार सूर्य भगवान के सात घोड़े हैं( सात किरणें)।
जिनके नाम हैं- जया, अजया, विजया, जीत प्राण जीत कर्मा, मनोजपा, जीतक्रोध।
जया- पहली किरण से दृढ़ विश्वास मानसिक और शारीरिक शक्ति दूसरों का अच्छाई और परोपकार की भावना आती है।
अजया-इस किरण से दया शांति बुद्धिमता और आंतरिक समझ मिलती है।
विजया-इसे पढ़ने की आदत सोच और आध्यात्मिकता मिलती है
जीत प्राण-गहरी सोच अत्यधिक दयालु
जीत कर्म- अनुशासन अत्यधिक ज्ञान और वैज्ञानिक मूल्यांकन
मनोजप- समर्पण और भक्ति इमानदारी और सत्य का रास्ता
जीत क्रोध- गहराई से मूल्यांकन कलात्मक सौंदर्य का बोध
Surya Dev Ke Rath Ke Saat Chhand-सात छंद
गायत्री, जागृति, उष्णिक, त्रिष्टुप, अनुष्टुप, पंक्ति छः घोड़े बने। बृहती छंद रथ के बीच की गद्दी बना। सूर्य देव छंदों के रथ पर सवार होकर अंतरिक्ष की यात्रा करते हैं।
Surya Dev Ki Saat Kirine-सात किरणें
सूर्य देव की ग्रह-संज्ञक सात किरणें हैं- सुषुम्ना, सुरादना, उदन्वसु /सयंद्वसु, विश्वकर्मा, उदावसु, विश्वरुचा/अखराट, हरिकेश
सुषुम्ना रश्मि चन्द्रमा का पोषण करती है।इसका तेज हजारों किरणों के समान है जो कि चन्द्रमा की सुंदरता का कारण है। सुषुम्ना नामक रश्मि चन्द्रमण्डल को प्रकाशित करती हुई चन्द्र तल से अमृत बिन्दुओ को पृथ्वी तक पहुचाती है।जिनसे जीवन का संचार होता है।जीवन के दृश्य के लिए जड़ अथवा चेतन बिना शरीर पंच महाभूतो के मिश्रण से दृश्य नही हो सकता।
सुरादना इस किरण से चन्द्रमा की उत्पत्ति हुई है।
विश्वकर्मा नामक रश्मि भू तत्व की संचालिका है यह बुध को प्रकाशित एवम् पोषित करती है।
विश्वव्यचा/अखराट जो शुक्र और शनि को पोषित करती है। शुक्र वीर्य का कारक है और शनि मृत्यु का। इसलिए इस किरण की पूजा करने से जीव को लम्बी आयु मिलती है।
उदन्वसु/संयद्वसु तेज की संचालिका होने के कारण मंगल को पोषित करती है।यह किरण मनुष्यों की रक्त सम्बन्धी विकारों से रक्षा करती है और स्वास्थ्य ,तेज और वैभव देती है।
अर्वावसु/उदावसु आकाश तत्व की संचालिका होने से बृहस्पति को पोषित करती है तथा बृहस्पति ग्रह सभी प्राणियों का कल्याण करता है।
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। गुरु पूर्णिमा भारतवर्ष की महान गुरु शिष्य परम्परा को समर्पित पर्व है। यह दिन गुरु और शिष्य दोनों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस दिन शिष्य अपने गुरु का पूजन और वंदन कर उनके द्वारा प्रदान किए ज्ञान के प्रति आभार प्रकट करते हैं।
गुरु पूर्णिमा 3 जुलाई 2023, सोमवार। पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ – 02 जुलाई 2023 को 08:21 पी एम पर। पूर्णिमा तिथि समाप्ति – 03 जुलाई 2023 को 05:08 पी एम पर।
Guru Purnima Ka Mahatva-गुरुपूर्णिमा का महत्व
यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है।
ऐसी मान्यता है कि गुरुपूर्णिमा के दिन ही भगवान शिव (प्रथम योगी), एक गुरु बने और योग-विज्ञान की तकनीक को पहेली बार सप्तऋषियों को प्रदान किया |
गुरु पूर्णिमा को बौद्धों द्वारा गौतम बुद्ध के सम्मान में भी मनाया जाता है। बौद्ध धर्म के अनुयायियों का मानना है कि गुरु पूर्णिमा के दिन ही गौतम बुद्ध ने उत्तर प्रदेश के सारनाथ नामक स्थान पर पांच भिक्षुओं कौण्डिण्य, वप्प, भद्दीय, अस्सजि और महानाम को अपना प्रथम उपदेश दिया था।
Guru Ka Arth-गुरु शब्द का अर्थ
गुरु शब्द गु + रु से मिलकर बना है। संस्कृत में गु का अर्थ होता है अंधकार तथा रु का अर्थ होता है वध करना, समाप्त करना। अतः गुरु का अर्थ हुआ – अंधकार को समाप्त करने वाला।
गुरु वह होता है जो हमारे मन में व्याप्त अज्ञान रूपी अंधकार को समाप्त कर देता है और हमें ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर अग्रसर करता है। यू तो व्यावहारिक रूप से हम शिक्षक को भी गुरु बोल देते हैं परन्तु वह सम्पूर्ण रूप से गुरु नहीं है।
वास्तविक गुरु तो वह है जो हमें इस संसार रूपी भव सागर से तारने वाला ज्ञान प्रदान करे। कबीर दास के अनुसार –
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट। अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।
गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा है, भीतर से हाथ का सहार देकर, बाहर से चोट मार – मारकर और गढ़ – गढ़ कर शिष्य की बुराई को निकलते हैं।
Guru Ka Mahatva-गुरु का महत्व
जिस किसी से भी हम ज्ञान प्राप्त करें वह हमारा गुरु ही होता है। देखा जाय तो जब कोई बच्चा जन्म लेता है तो सर्वप्रथम वह अपने माता-पिता, और घर के बड़े बुजुर्गों द्वारा ही सीखता है। कहा जा सकता है किसी बच्चे की प्रथम गुरु तो माता ही होती है। तत्पश्चात बच्चा विद्यालय जाकर ज्ञानार्जन करता है तथा अपने आस-पड़ोस के वातावरण से सीखता है। ।
परन्तु आत्मिक ज्ञान जिसके द्वारा व्यक्ति इस संसार रूपी भवसागर को पार कर जाता है उसके लिए गुरु का होना आवश्यक है।
संत कबीर दास के अनुसार
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
कबीर दास जी कहते हैं, कि यह जो शरीर है वह विष सामान बुराइयों (जहर) से भरा हुआ है और एक सच्चा गुरु, अमृत की खान अर्थात उन विष सामान बुराइयों का अंत करने वाला होता हैं।
गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष। गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मैटैं न दोष।।
कबीर दास जी कहते हैं – गुरु के बिना ज्ञान का मिलना असंभव है। जब तक कि गुरु कि कृपा नहीं प्राप्त होती तब तक मनुष्य अज्ञान रुपी अंधकार मे भटकता हुआ मायारूपी सांसारिक बन्धनो मे जकड़ा रहता है। मोक्ष रुपी मार्ग दिखलाने वाले गुरु हैं। गुरु के बिना सत्य एवम् असत्य का ज्ञान नहीं होता न ही व्यक्ति अपने दोषों को मिटा पाता है।
गुरु और शिक्षक में अंतर
आधुनिक काल में बच्चे स्कूल जाते हैं जहाँ उन्हें अध्यापकों के द्वारा भाषा,गणित विज्ञानादि विषयों का ज्ञान मिलता जिसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को जीवकोपार्जन हेतु उपयुक्त बनाना होता है। वहाँ पर शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बच्चे के अंदर विभिन्न कौशलों का विकास करना होता है जिनके द्वारा वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सके। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में स्वयं को जानना , अध्यात्म की शिक्षा आदि का आभाव ही दिखता है।
प्राचीनकाल में गुरुकुल होते थे जिनका उद्देश्य बच्चे को शिक्षित करने के साथ-साथ उनका आध्यात्मिक विकास करना भी होता था। अतः गुरुकुल व्यवस्था में गुरु को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।
अतः हम कह सकते हैं कि प्राचीनकाल में गुरु का स्थान था वह आज के शिक्षक से कहीं अधिक बृहत और उच्च था।
क्या गुरु का होना आवश्यक है
गुरु का होना आवश्यक अवश्य है परन्तु अनिवार्य नहीं। हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान दत्तात्रेय ने आत्मा को स्वयं का गुरु माना था। उन्होंने प्रकृति, वस्तुओं, जीव-जंतुओं और व्यक्तियों का अवलोकन करके आत्म-ज्ञान प्राप्त किया।
एक बार उनसे जंगल विहार करते समय यदु वंश के राजा से भेंट हुई। राजा ने उनसे उनकी प्रसन्नता का रहस्य और उनके गुरु का नाम पूछा। जब दत्तात्रेय जी ने बताया कि उनका गुरु स्वयं उनकी आत्मा है तथा उन्होंने 24 लोगों से ज्ञान लिया है जो उनके गुरु कहलाए।
दत्तात्रेय जी के 24 गुरु हैं: 1. पृथ्वी, 2. जल, 3. वायु, 4. अग्नि, 5. आकाश, 6. चंद्रमा, 7. सूर्य, 8. कबूतर, 9. अजगर, 10. महासागर, 11. पतंगा, 12 मधुमक्खी, 13. शहद इकट्ठा करने वाली, 14. हाथी, 15. हिरण, 16. मछली, 17. नर्तकी पिंगला, 18. कौआ, 19. बच्चा, 20. युवती, 21. नागिन, 22. एक तीर बनाने वाली , 23. मकड़ी और 24. भृंग।
परन्तु कुछ साधनाएं ऐसी अवश्य होती हैं जिनमें गुरु का होना अनिवार्य होता है। गुरु का होना साधक की आध्यात्मिक यात्रा को सहज और आसान बना देता है।
गुरु किसे बनाएं
यद्यपि हम सभी चाहते हैं कि हमें अच्छे गुरु की प्राप्ति हो परन्तु अच्छे गुरु की प्राप्ति ईश्वर की कृपा के बिना संभव नहीं है। हमें एक ऐसे व्यक्ति को अपना गुरु बनाना चाहिए जो हमारी समस्त शंकाओं का समाधान करने में समर्थ हो। कबीर दास के अनुसार –
जो गुरु ते भ्रम न मिटे, भ्रान्ति न जिसका जाय। सो गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय।
यदि कोई गुरु शिष्य की शंकाओं को ही दूर न कर सके, तो उस गुरु को त्यागने में ही भलाई है। यदि कोई गुरु भौतिक अथवा सांसारिक लाभ प्रदान करने का दावा करता है, तो समझ लीजिए उस गुरु में खोट है और वह त्याज्य है। चमत्कारिक शक्तियों का सार्वजनिक प्रदर्शन करने वाले व्यक्तियों से भी दूर ही रहना चाहिए।
तो फिर सद्गुरु की पहचान कैसे करें ?
सतगुरू की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार। लोचन अनंत उघाडिया, अनंत दिखावणहार।
ज्ञान के आलोक से संपन्न सद्गुरु की महिमा अनंत(जिसका वर्णन न किया जा सके) है। उन्होंने मुझपर जो उपकार किया है वह भी असीम है। उन्होंने मेरे अपार शक्ति संपन्न ज्ञान-चक्षु को खोल दिया जिससे मैं परम तत्व का साक्षात्कार कर सका। ईश्वरीय आलोक को दिखाने का श्रेय महान गुरु को ही है।
यदि आपको कोई योग्य गुरु न मिल रहा हो तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। आप अपने इष्ट जैसे-भगवान शिव, हनुमान जी को ही गुरु मानकर साधना के मार्ग पर अग्रसर रहें। जब ईश्वर की अनुकम्पा होगी तो आपको योग्य गुरु की प्राप्ति अवश्य होगी।
Guru Purnima Par Kya Karen-गुरु पूर्णिमा पर क्या करें
गुरु पूर्णिमा के दिन यदि आपके कोई गुरु हैं तो इस दिन उनके दर्शन अवश्य करें तथा उनका आशीर्वाद अवश्य लें। अपने गुरु को अपनी सामर्थ्यानुसार कोई भेंट अवश्य दें। भेंट में आप गुरु को श्वेत अथवा पीले वस्त्र, मिठाई, फल आदि दें सकते हैं। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है इस दिन गुरु द्वारा मिले ज्ञान के लिए आभार प्रकट करना। क्योंकि बिना गुरु की कृपा के मनुष्य के विकारों का नष्ट होना संभव नहीं है।कबीर दास जी कहते हैं –
बलिहारी गुर आपणैं, द्यौंहाडी कै बार। जिनि मानिष तैं देवता, करत न लागी बार।
गुरु की महिमा है की वह सामान्य जन को मनुष्य से देवता तुल्य बना देता है और ऐसा करने में उसे तनिक भी देर नहीं लगती है। ऐसे गुरु को मैं दिन में कितनी बार बलिहारी जाऊं/ नमन करूँ तात्पर्य है की ऐसे गुरु के चरणों में जितनी भी बार नमन करें कम ही होता है। यहाँ देवता तुल्य से आश्रय है कि गुरु मनुष्य के विकारों को नष्ट कर उसे देव तुल्य बना देता है।
आप गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने हेतु गुरु स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि गुरु न भी हो तो इस दिन अपने इष्ट के दर्शन करें और उनका पूजन करें।
पंचकोश(panchkosh) क्या है? आधुनिक विज्ञान ने अपने वैज्ञानिक संसाधनों से स्थूल शरीर की बनावट का तो विस्तार से अध्ययन किया है परंतु यह अध्ययन कितना भी गहन क्यों न हो पर संपूर्ण नहीं है क्योंकि यह भौतिक शरीर के अध्ययन तक ही सीमित है।
परंतु मानव केवल भौतिक शरीर नहीं है अपितु स्थूल शरीर समग्र शरीर का छोटा सा अंश है। मानव व्यक्तित्व के दो घटक है- पदार्थ और चेतना।
पदार्थ से जहां भौतिक शरीर निर्मित है वही चेतना व्यक्तित्व को जीवन प्रदान करती हैं ।
पदार्थ स्थूल शरीर का निर्माण करता है वही चेतना स्थूल शरीर सहित सूक्ष्म और कारण शरीर को प्रक्षेपित करते हुए उन्हें जीवंत बनाए रखती है। पदार्थ भी चेतना के अभाव में भौतिक शरीर निर्जीव हो जाता है।
स्वयं अभिव्यक्त करने के लिए चेतना को भौतिक अथवा स्थूल शरीर के रूप में माध्यम की आवश्यकता होती है।दोनों एक दूसरे के लिए आवश्यक है अतः केवल भौतिक शरीर के अध्ययन से मानव शरीर की संरचना का अध्ययन नहीं होता।
अनेक विद्वान् और ज्ञानीजन शरीर को ईश्वर प्राप्ति के लिए एक साधन (उपकरण) मात्र मानते हैं ।वास्तव में आत्मा अजर है अमर है। वह केवल वस्त्र की भाँति शरीर को धारण करती है और जीर्ण हो जाने पर पुराने शरीर का त्याग कर नया शरीर धारण करती है।
योग दृष्टि से शरीर तीन प्रकार के हैं
भौतिक या स्थूल शरीर
सूक्ष्म शरीर और
कारण शरीर
Panchkosh- पंचकोश
Sthul Sharir-स्थूल शरीर
इस भौतिक, नश्वर पंचभूतों से निर्मित शरीर को “स्थूल शरीर” कहते है। यह रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र से बना होता है और स्थूल शरीर के द्वारा ही हम विभिन्न प्रकार के अनुभव करते हैं।
जाग्रत अवस्था में स्थूल शरीर का अनुभव होता है। विवेक चूड़ामणि के अनुसार –
मज्जा, अस्थि, मेद, मांस, रक्त, चर्म और त्वचा- इन सात धातुओं से बने हुए तथा चरण, जंघा, वक्षस्थल भुजा, पीठ और मस्तक आदि अंगोंपांगो से युक्त “मैं और मेरा” रूप से प्रसिद्ध इस मोह के आश्रय रूप देह को विद्वान् लोग स्थूल शरीर कहते हैं।
आकाश,वायु, जल, तेज और पृथ्वी- ये सूक्ष्म भूत हैं। इनके अंश परस्पर मिलने से स्थूल होकर स्थूल शरीर के हेतु होते हैं और इन्हीं की तन्मात्राएँ भोक्ता जीव के भोगरूप सुख के लिए शब्दादि पांच विषय हो जाते हैं।
विवेक चूड़ामणि में आदि शंकरचार्य ने स्थूल शरीर को निंदनीय बताया है। पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार पंच भूतों से निर्मित यह स्थूल शरीर आत्मा का भोगायतन है। इसकी अवस्था जाग्रत है जिसमें स्थूल पदार्थों का अनुभव होता है।
स्थूल शरीर के माध्यम से ही जीव को सम्पूर्ण बाह्य जगत प्रतीत होता है।
Sukshm Sharir-सूक्ष्म शरीर
सूक्ष्म शरीर वह है जो इस भौतिक या स्थूल शरीर को चलाने वाला होता है। पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, पांच कर्मेन्द्रियाँ, अंतःकरण चतुष्ट्य और उनकी पञ्च तन्मात्रा शब्द, स्पर्श, रूप, रास, गंध ये सूक्ष्म शरीर का निर्माण होता है। इसकी अस्वस्था स्वपनावस्था होती है।
बुद्ध्याद्याविद्यापि च कामकर्मणि पुर्यष्टकम सूक्ष्मशरीरमाहुः।
वागादि पांच कर्मेन्द्रियाँ, श्रवणादि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राणादि पाँच प्राण, आकाशादि पाँच भूत, बुद्धि आदि अंतःकरण चतुष्टय, अविद्या तथा काम और कर्म यह पुर्यष्टक अथवा सूक्ष्म शरीर कहलाता है।
यह सूक्ष्म शरीर अपंचीकृत भूतों से उत्पन्न हुआ है। यह वासनायुक्त होकर कर्म फलों का अनुभव कराने वाला है।
श्रवण, त्वचा, नेत्र, घ्राण और जिह्वा ये पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, क्योंकि इनसे विषय का ज्ञान होता है। तथा वाक्, पाणि, पाद, गुदा और उपस्थि ये पांच कर्मेन्द्रियाँ हैं।
अपनी वृत्तियों के कारण अंतःकरण मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इन चार नाम से जाना जाता है। संकल्प विकल्प के कारण मन, पदार्थ का निश्चय करने के कारण बुद्धि, मैं-मैं ऐसा अभिमान करने के कारण अहंकार और अपना इष्ट-चिंतन के कारण यह चित्त कहलाता है।
जल और स्वर्ण के समान अपने विकारों के कारण स्वयं प्राण ही प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान ये पांच प्राण होते हैं।
स्वप्न इसकी अभिव्यक्ति की अवस्था है। लिंग अर्थात सूक्ष्म शरीर ही सम्पूर्ण कर्मों का कारण है। सम्पूर्ण कर्मों को सूक्ष्म शरीर ही करता है और उनके फलों को भोगता है।
Karan Sharir-कारण शरीर
तीन गुणों(सत, रज, तम) के संघात को स्वभाव जनित कारण शरीर कहते हैं। इसकी अवस्था सुषुप्ति होती है।
इस प्रकार से तीन गुणों के निरूपण से यह अव्यक्त का वर्णन हुआ। यही आत्मा का कारण शरीर है। इसकी अभिव्यक्ति की अवस्था सुषुप्ति है, जिसमें बुद्धि की सम्पूर्ण वृत्तियाँ लीन हो जाती हैं।
जहाँ सब प्रकार की प्रमा शांत हो जाती है और बुद्धि बीजरूप से स्थिर रहती है, वह सुषुप्ति अवस्था है इसकी प्रतीति “मैं कुछ नहीं जानता ” ऐसी लोक प्रसिद्ध उक्ति से होती है।
शरीर पुनः पंचकोश(panchkosh) में विभाजित है।
Panchkosh Ka Vargikaran-पंचकोश का वर्गीकरण
Panchkosh-पंचकोश
तीनों शरीर को पुनः 5 कोशों पंचकोश(panchkosh) में विभक्त किया गया है।
अन्नमय कोश
प्राणमय कोश
मनोमय कोश
विज्ञानमय कोश
आनन्दमय कोश
Annmay Kosh-अन्नमय कोश
यह स्थूल शरीर को निर्मित करता है। यह स्वयं पंच स्थूल तत्वों से निर्मित है जो विभिन्न अनुपात में मिलकर भौतिक शरीर में अस्थि, रक्त, मांस और अन्य अवयवों का निर्माण करता है क्योंकि इसको अन्न से पोषण प्राप्त होता है इसलिए इसे अन्नमय कोश कहा जाता है।
शरीर का जो भाग इन्द्रियों से ज्ञात होता है वह सब अन्नमय कोश का ही भाग है। विवेक चूड़ामणि के अनुसार –
त्वक्चर्ममांसरुधिरास्थिपुरीषराशिर्नायं स्वयं भवितुमर्हति नित्यशुद्धः।
अन्न से उत्पन्न हुआ यह दे यह अन्नमय कोष है जो अन्न से ही जीता है और उसके बिना नष्ट हो जाता है यह त्वचा चर्म, मांस, रुधिर, अस्थि और मल आदि का समूह स्वयं नित्य शुद्ध आत्मा नहीं हो सकता।
Pranmay Kosh-प्राणमय कोश
यह सूक्ष्म शरीर को निर्मित करने वाला प्रमुख कोष है
यह सूक्ष्म शरीर को निर्मित करने वाला मुख्य कोश है। यह स्वयं पांच मुख्य प्राण और चार उपप्राणों से निर्मित है। स्थूल शरीर को क्रियाशील और जीवंत रखने वाला यही है। स्थूल शरीर की तरह ही सूक्ष्म शरीर में सूक्ष्म नाड़ियों का जाल बिछा होता है जिसमे प्राणों का प्रवाह होता है।
प्राणमय कोश सांस के माध्यम से स्थूल शरीर से जुड़ा होता है। इसलिए विशेष प्रकार के सांस का नियमन करने से प्राणों को नियंत्रित किया जाता है।
पांच कर्मेंद्रियों से युक्त यह प्राण ही प्राणमय कोश कहलाता है जिस से युक्त यह अन्नमय कोश अन्न से तृप्त होकर समस्त कर्म में प्रवृत्त होता है।
Manomay Kosh-मनोमय कोश
प्राणमय कोश को नियंत्रित करने का काम मनोमय कोश करता है।मन के द्वारा प्राणों को नियंत्रित किया जाता है यह प्राणमय कोश से भी सूक्ष्म है। सूक्ष्म इंद्रियां जो सूक्ष्म तत्वों से निर्मित है वे भी इसी कोश के नियंत्रण में होती हैं।
मनस या चेतन मन और अवचेतन मन इसके अंतर्गत आते हैं। इसमें वासनाये(सूक्ष्म कामना) संग्रहित रहती है।
ज्ञानेन्द्रियाणि च मनश्च मनोमयः स्यात् कोशो ममाहमिति वस्तुविकल्पहेतुः।
ज्ञानेंद्रियां और मन ही “मैं मेरा” आदि विकल्पों का हेतु मनोमय कोश है जो नाम आदि भेद कलनाओं(ग्रहण करना या ज्ञान) से जाना जाता है और बड़ा बलवान है तथा पूर्व कोशों को व्याप्त करके स्थित है।
Vigyanmay Kosh-विज्ञानमय कोश
यह भी सूक्ष्म शरीर का ही एक अंश है। प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय कोश मिलकर सूक्ष्म शरीर बनाते हैं। यह मनोमय कोश को नियंत्रित करता है और मन से भी सूक्ष्म बुद्धि और अहं का केन्द्र है। स्थूल शरीर को सूक्ष्म शरीर ही प्रक्षेपित करता है।
ज्ञानेन्द्रियों के साथ वृत्तियुक्त बुद्धि ही कर्तापन के स्वाभाव वाला विज्ञानमय कोश है जो पुरुष के जन्म मरण का कारण है।
चित और इंद्रियादि का अनुगमन करने वाली चेतन की प्रतिबिम्ब शक्ति ही ‘विज्ञान’ नामक प्रकृति का विकार है । वह मैं ज्ञान और क्रियावान हूं ऐसा देह इन्द्रिय आदि में निरंतर अभिमान किया जाता है।
Anandmay Kosh-आनंदमय कोश
आनंदमय कोश और कारण शरीर दोनों एक ही हैं। यह व्यक्तित्व का गहनतम केंद्र है। आत्मा का प्रतिबिंब इसी में एक भ्रामक केंद्र बनाकर स्वयं को एक सीमित व्यक्तित्व के रूप में अनुभव करता है।
इस अनुभव का कारण चित्त में विद्यमान अविद्या का एक आवरण है। यह सूक्ष्म और स्थूल शरीर को प्रक्षेपित करता है। विवेक चूड़ामणि के अनुसार –
आनंदस्वरूप आत्मा के प्रतिबिम्ब से चुम्बित तथा तमोगुण से प्रकट हुई वृत्ति आनंदमय कोश है। वह प्रिय आदि (प्रिय, मोद और प्रमोद) गुणों से युक्त है और अपने अभीष्ट पदार्थ के प्राप्त होने पर प्रकट होती है।
पुण्य कर्म के परिपक्व होने पर उसके फलस्वरूप सुख का अनुभव करते समय भाग्यवान पुरुषों को उस आनंदमय कोशका स्वयं ही भान होता है जिससे संपूर्ण देहधारी जीव बिना प्रयत्न के ही अति आनंदित होते हैं।